धरती पर उतरीं

भूखल अँखिया सूखल ओठ, ताक रहल बा तोहरी ओर

इनकर पीर हरीं ।

 

शादी के हव घर मे बाला

मुँह न निवाला एतना ठाला

ई त हव गरीब के कम्बल

जेतना धोवै ओतना काला

तोहऊँ काला तब्बो माला, फेकत हव सब तोहरी ओर

अब्बो शरम करीं ॥

 

हम गुदरी मे जीयै वाला

नाही चाही शाल दुसाला

जी डी पी के हम का जानी

हमके तs रोटी कs लाला

सूखल बूड़ल एह माटी मे छाती पीटै करिया गोर

अब तs रहम करीं ॥

 

कमर लँगोटी हाथ लकुटिया

घर अइसन जस टूटल टटिया

भिनकत बरतन हुनकत चुल्हा

दुअरे पर पुस्तैनी खटिया

चारी ओर अन्हार जिनिगिया, रात कटी कब होई भोर

केतना धीर धरीं ॥

 

येह हथवा के चाही काम

अब मत देहीं झाँसा-झाम

हमनी के अब भीख न चाही

आशा के चाही अंजाम

बहुत हो गयल कुछ तs सोची , तनिका देखीं हमरी ओर

धरती पर उतरीं ॥

 

  • मोहन द्विवेदी

Related posts

Leave a Comment