जनगीत आ भोजपुरी जनगीत

जनगीत में जन आ गीत एक साथे बा।एह में जन पहिले बा आ गीत बाद में।एह पहिले आ बाद के जवन मतलब ह तवन ई ह कि जन के कंठ में गीत बसेला,ओकर हिया से गीत फूटेला।जन आ गीत के जुगलबन्दी में पूरा जीवन धड़केला।राग-रंग के साथे विरह-बिछोह,दुख-तकलीफ आ जीवन-संघर्ष।सज्जी समाज मय नाता-रिश्ता के साथे।जनगीत कवनो एगो भाषा आ देश के चीज ना ह।हर देश हर भाषा में पावल जाला।हँ, ओकर रूप आ अभिव्यक्ति अलग -अलग होला आ बहुत कुछ आश्चर्यजनक रूप से मिलतो जुलत होला।जनगीत के हालाँकि एगो खास अर्थ में आज जानल जाला,ओही अर्थ में ओकर स्वीकृति मिलल बा।1970 के बाद जब नुक्कड़ नाटक के दौर शुरू होत बा, ओही के आसपास गीत के एह कांसेप्ट देने साहित्यिक जन के ध्यान गइल।रचना-आलोचना के लेके नया चिंता आ चिंतन के साथे ‘लघु पत्रिका’ एही दौर में एगो सार्थक हस्तक्षेप के संगे अइली स।जन आन्दोलन एह सबके पृष्ठभूमि में रहे।जनगीत एही दौर में जन आंदोलन के जगह,जरूरत,धार आ विस्तार के समझ आ चिंता के साथे गीत -लोकगीत के जमीन पर आकार लेत लउकेला।हिंदी के जवन नवगीत ह, ओकरे तर्ज प भोजपुरियो में नवगीत आइल। जनगीत ओह के बाद चरचा में आइल आ अपना समूचा कथपद में ऊ एकरो से संवाद के साथे आइल।देखल जा सकेला कि जनगीत जनभाषा भोजपुरी के साथे साथ हिन्दियो में लिखाइल।आ अउरियो कुल्हि भाषा में।ई समुझल जरूरी बा कि जनगीत के सम्बंध जन,जनभाषा आ जनसरोकार से बा।एह प विचार करत एहिजा एगो बात देने ध्यान जाए से नइखे रहत कि हिंदी के जनभाषा मानल जा सकेला कि नाहीं। उत्तर जदी ना में होई त! त,ई कि जनगीत आ जनभाषा वाली बात सही नइखे।बाकी ई त एगो ऐतिहासिक सचाई बा कि जनगीत  हिन्दियो में खूब लिखाइल बा आ खूब मशहूर भइल बा।खूब जनप्रिय।साथे साथ इहो कि जनगीत चर्चा-परिचर्चा में आइल पहिले हिंदिये के हलका से।एहिजा देखे के चाहीं कि हिंदी के जनगीत भाषा के स्तर प परिनिष्ठित हिंदी के अस्वीकार आ जनभाषा के स्वीकार के साथे आइल।भोजपुरी क्षेत्र के हिंदी-जनगीत भोजपुरी के तरफ ना खाली झुकल बलुक बहुते आत्मीय रिश्ता बनवलस।अइसन कि भोजपुरियाइन लागे लागल।जन आ जनसरोकार से संवाद जनगीत के अनिवार्य शर्त ह।एही के नाते हिंदी में जनगीत खूब जमल आ हिंदिओ जन जन तक पहुँचल।आ भोजपुरी में त जनगीत के पुरहर स्पेस मिलल।पहिले से जवन रहे (गीत,लोकगीत)तवना के नया दिशा,चेतना आ एगो अभियान मिल गइल।पहिले से लोकगीत रहे।भोजपुरी के जनगीत भोजपुरी लोकगीत से बेशक आगे के चीज ह , बाकी, ओकरा से ऊ एकदम अलग ना ह।अलग देखल ठीको ना होई।काहे कि फॉर्म के स्तर पर जनगीत जे बा ऊ लोकगीत से बहुते कुछ लेले बा।लोकगीत के जतना ले रूप बा,धुन आ लय  – पूरा टेकनीक,जनगीत ओह सबके अपनाके चलल।कजरी, सोहर,चइता, बिरहा,खेलौना, जँतसार,फगुआ,लोरकी सब।अतने ले ना जनगीत एह सबके आपुस में मिला के प्रस्तुति के ना खाली नया फॉम तलसलस, बलुक प्रभावी आस्वाद के साथे युगसत्य के सम्बोधित कइलस।एहिजा तुरत उदाहरण के रूप में प्रकाश उदय के कुछ गीतन के देखल जा सकेला।एके गीत में हिंदी आ भोजपुरी दूनो आ संगही एके में कई गो धुन- ‘नखरे देखो धोती में जारबन लगी’ , ‘काहो का हालचाल’ आ ‘घुस जा पूत समंदर में’।

जनगीत के जनवादी गीत भी कहल जाला।एक दौर में नुक्कड़ो नाटकन में एह गीतन के खूब इस्तेमाल भइल बा।कवनो-कवनो नाटक में त गीत नाटक के हिस्सा बा।एकरा अलावा नुक्कड़ नाटक खातिर मजमो जुटावे में एह गीतन के खूब इस्तेमाल भइल बा आ आजो हो रहल बा।एह गीतन के जरिये समसामयिक सवालन के जनता के बीचे ले जाए के जरूरी काम आजो हो रहल बा।स्थानीय सवालन के साथे साथ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीयो सवाल एह माध्यम के जरिये जनसमूह तक सीधे पहुँचेला।एकर रचना करेवाला लोगन में पढ़ल-लिखल से लेके अनपढ़(स्कूली तौर प)तक के बहुत महत्वपूर्ण भूमिका बा।उच्च शिक्षाप्राप्त गोरख पांडेय बाड़न आ साथे साथ दुर्गेन्द्र अकारी जे आपन डिग्री खुदे बतावेलें -‘एल.एल.पी.पी.’।जनसामान्य में ई एल.एल.पी.पी.खूब प्रचलित बा जेकर फुलफार्म ह–“लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर”। बाकिर उनकर एल.एल.पी.पी. कबीर के ‘मसि कागद छुवौ नहीं” जस बा जवना में ज्ञान जीवन,समाज आ अनेक तरह के बहस आ संघर्ष से हासिल बा। गोरख पांडेय भी आपन उच्च शिक्षा से अर्जित ज्ञान के जनता के जीवन आ संघर्ष से एकाकार कई के गीतन के रचना कइलें।उनके गाँव के दलित समुदाय के एगो आदमी बातचीत में बतवलस कि पांडेय जी(गोरख) हमनी किहाँ बइठत रहलें हमनी से गीत सुनत रहलें आ आपनो लिखल सुनावत रहलें।गोरख जी सुनत-सुनावत जन के भीतर के ताप आ बेचैनी समझत रहलें।

उन्नीस सौ सत्तर के बाद बड़ी तेजी से जनगीत जन से जुड़े, संवाद बनावे के माध्यम बनल।शहर के नुक्कड़ से गाँव के टोला-टापर आ आम आदमी के बइठकी तक पहुँचल।1980-85 के बाद त बिहार के भोजपुरी -क्षेत्र के हर गाँव के गरीब टोली तक ई जगह पा चुकल रहे।भोजपुरी क्षेत्र के बाहरो भोजपुरी जनगीत जनजुबान प चढ़ि गइल रहे।यू.पी.के बनारस चंदौली, गाजीपुर,बलिया,आजमगढ़,सोनभद्र तक।माने जहाँ जहाँ जनांदोलन रहे, किसान-मजदूर संगठन आ संघर्ष रहे, उहाँ -उहाँ जनगीत रहे।बिहार के भोजपुर के सिकरियाँ गाँव के साहेब राम आ झगरू राम के बैंड पार्टी रहे।दूगो पार्टी।शादी भा कवनो उत्सव के मोका प ई लोग सट्टा प जात रहे।दूनो जना के टीम के कलाकार ओह समय इंडियन पीपुल्स फ्रंट से जुड़ल रहे। पारम्परिक-प्रचलित गीतन के बीच-बीच में बहुते भाव के साथे जनगीत गावत रहे लोग।गोरख पांडेय,रमता जी,विजेंद्र अनिल,दुर्गेन्द्र अकारी,कृष्ण कुमार निर्मोही के दर्जनों गीत एह लोग के कंठस्थ रहे।कुछ त ई लोग अपनहूँ से बना लेत रहे।फगुआ-चइता के मोको प पारम्परिक गीतन के साथे जनगीत।माइक प अनाउंस क के।ऊ लोग एह गीतन के जनवादी गीत कहत रहे।ओह बखत आरा में “युवानीति” नामके एगो नाटक टीम रहे जवन कि शहर के साथे साथ गांवागाईं नाटक आ गीत प्रस्तुत करत रहे।पटना के “हिरावल” आ “कोरस” आजो ई काम क रहल बा।संतोष झा हिरावल के कलाकार हवें।हिरावल के गावल गीत यू ट्यूब प सुनल जा सकेला।जनचेतना एह गीत के केंद्र में बा।कहल उचित रही कि जनगीत वाम जनवादी राजनीति के सांस्कृतिक अभियान के जरूरी हिस्सा ह।हर धरना,प्रदर्शन,रैली,नुक्कड़ सभा में ई गीत आपन बखूबी भूमिका निभावत रहे।आंदोलन से जुड़ल मेहरारुओ कुल्हि गीत  बना -गा लेत रहे लोग।ई गीत ओह समय के जरुरत रहे।आजो एकर जरुरत बा।ओह दौर में एकर जतना पहुँच-पसार रहे,ओतना त नइखे बाकी ई कमबेसी अबहियों बा।नया गवनिहार में चंदन तिवारी आ उनकर टीम एह गीतन के गा रहल बा लोग।एह दौर में , खासकर नोटबन्दी के लेके कुछ नीमन गीत लिखाइल बा।2014 के बाद के राजनीतिक जाल-फरेब आ सत्ता के जनविरोधी रीति-नीति के लेके भोजपुरी में  कइगो नीमन गीत देखे-सुने के मिल रहल बा।कृष्ण कुमार निर्मोही,संतोष सहर,सुमन कुमार सिंह के कुछ गीत बहुते दमदार बा।संतोष सहर के नोटबन्दी प एगो गीत ह–“कइलन नोटबन्दी टूटल हमनी प अफतिया/ मोदी घतिया

कइलन।” ई गीत ‘समकालीन जनमत’ में छपल रहे।

बात जब एह गीतन के छपे प आइल त कुछ अउर कहे के बा।समय -समय एह गीतन के पुस्तिको छपल बाड़ी स।कबो इप्टा से त कबो जन संस्कृति मंच से त कबो प्रलेस,जलेस से।ओह में हिंदी,भोजपुरी सहित अउरी भाषा के जनगीतन के जगह मिलल बा।गीतकार शैलेन्द्र,फैज,शलभ श्रीराम सिंह,बली सिंह चीमा,गोरख,जमुई खां आजाद,विजेंद्र अनिल के साथे दोसरो भाषा के गीतकार लोग के गीत बा।अतने ले नाहीं,कुछ पोपुलर लोकगीतो के जगह मिलल बा।कुछ साल पहिले जसम से ‘नया विहान’ नाँव से एगो पुस्तिका आइल बा जवना में रमता जी ,विजेंद्र अनिल आ प्रकाश उदय के भी गीत बा।हाले में नचिकेता के संपादन में एगो समृद्ध गीतकोश छपल बा।एह के देखे के चाहीं।प्रकाशन के मामिला में बड़ा कठिनाई बा।रमता जी के ‘ हमार सुनीं’ नाँव से बस एके गो संग्रह छपल बा जसम के तरफ से जेकर भूमिका संतोष सहर लिखलें बाड़न।ओह में उनकर कुछ चुनल गीत बा हिंदी आ भोजपुरी के।पहिला खण्ड हिंदी गीतन के बा आ दूसरा खण्ड भोजपुरी गीतन के।रमता जी के गुजरला एगारह साल से बेसिये भइल बाकी उनकर दोसर कवनो संग्रह ना छपल।वजह सभे बूझत बा।संतोष सहर महत्वपूर्ण काम कइले बाड़न कि रमता जी के घरे जाके उनकर अप्रकाशित रचना कुल्हि एकट्ठा क लेले बाड़न।100 से अधिक गीत उनका मिलल बा।रमता जी के गीतन के विषय के विविधता देखे जोग बा।देखल जाए कि रमता-समग्र कब आवत बा।संतोष सहर अउर एगो काम कइले बाड़न।दुर्गेन्द्र अकारी के गीतन के खोज के सुरक्षित रख लेले बाड़न।उनकर डायरी हमहूँ देखलीं।एगो जनगीतकार के रचना-प्रक्रिया ओह डायरी से समझ में आ रहल बा।ओह जनगीतकार के जेकर जिनगी गरीबी आ जनांदोलन में बीतल।जनांदोलन में जेल जाए के परल, जमींदार आ पुलिस के मार खाए के परल।अपना एगो गीत में लिखत बाड़न-“टूटल टाँग अकारी देखावे।”आपन गरीबियो के ऊ गीत में ले आइल बाड़न।बाकी ऊ अपना के ओह में कम देखवले बाड़न, देखा के सहानुभूति बटोरल उनका पसन ना रहे।सुधीर सुमन उनका बारे में लिखले बाड़न जवन समकालीन जनमत में छपल बा।उनका बारे में प्रकाश उदय भी लिखले बाड़न।अपना आलेखन में उनकर चर्चा प्रमुखता से कइले बाड़न।एहिजा हम आपन लिखल के चर्चा ठीक नइखीं समझत।अकारी जी के दूगो पुस्तिका हमरा भिरी बा।एगो ह-‘ मुकाबला’ आ दोसर ह ‘चाहे जान जाए’।’मुकाबला’ के भूमिका रमता जी लिखले बाड़न।अकारी जी आपन गीतन के पातर पुस्तिका छपवा के खुदे जुलूस आ रैली में ले आवत रहलें आ डेढ़-दू रूपया में बेंचत रहलें।ऊ कुल्हि एक जगह हो जाये त ठीक रही।अकारी जी राजनीतिक कार्यक्रम में जरूर शामिल होत रहलें।उनकर अधिकांश गीत हम कार्यक्रमे में सुनले बानी।ऊ कवि गोष्ठी में कबो नइखन लउकल।बाकी,जूझ में कबो पीछा नइखन हटल।ऊ लिखले बाड़न-“जीये के बा त लड़े के होई मुँह प।”विजेंद्र अनिल गीत-गजल के साथे साथ कहानियो लिखत रहलें।उनकर कई गो कहानी-संग्रह छपल बा।ऊ जनवादी गीतकार के साथे चर्चित जनवादी कहानीकारो रहलें।उनका गीतन के पुस्तिका रहे-” उमड़ल जनता के धार”।एकर कवर पेज चार प संतोष सहर के एगो टिप्पणी रहे।अरविंद कुमार जी बनारसी प्रसाद भोजपुरी साहित्य योजना के अंतर्गत उनकर गीतन के एगो पुस्तिका छपलें रहलें-‘विजेन्द्र अनिल के गीत’।बाद में एगो किताब आइल अरविंद जी के संपादन में -‘हम कबीर के बानी’।अनिल जी के गीत जनांदोलन के धार रहे।बरियार मोरचा बनावे के आह्वान – “मोरचा बनावs बरियार कि शुरू भइलें लमहर लड़इया हो।” विजेंद्र अनिल प एगो आलोचनात्मक किताब बा- ‘विजेंद्र अनिल होने का अर्थ’।ई किताब अभिधा प्रकाशन से आइल बा।बहुत काम लायक बा।गोरख  पांडेय के कविता आ गीत के संपूर्ण जन संस्कृति मंच के तरफ से आइल बा।एकरा पहिले ‘लोहा गरम हो गया है’ नाँव से संग्रह आइल रहे।जितेंद्र वर्मा गोरख के भोजपुरी गीतन के अलग से एगो संग्रह छपले बाड़न।गोरख के भोजपुरी गीतन के साथे साथ उनकर हिंदी कविता भी खूब पढ़ल-सुनल जाला।गोरख के गीत भोजपुर आ भोजपुरी के बाहरो खूब लोकप्रिय बा।लोकछन्द के अपना गीतन में सधल रचनात्मक उपयोग गोरख पाण्डेय कइले बाड़न।सोहर के तर्ज प बा –‘सूतल रहलीं सपन एक देखलीं/ सपनवा मनभावन हो सखिया।’ आखिर के लाइन ह –“बइरी पइसवा के राजवा मिटवलीं/ मिललें मोर साजन हो सखिया।” एगो लोकगीत ह -‘रेलिया ना बइरी जहजिया ना बइरी/ हो रोपेयवे बइरी ना।’ गोरख एह बइरी के राज के मिटावे के बात करत बाड़न।लोकगीत में बइरी के शिनाख्त बा ओकरा के मिटावे के संकल्प नइखे। गोरख लोक के शिनाख्त के संकल्प से जोड़त बाड़न।गोसेयाँ के लाठी के मुरई अस तूरे के जनशक्ति के समझ से जोड़त बाड़न।एहिजा से लोकगीत आ जनगीत के बीच के बारीक अंतर के समझल जा सकेला।

अकारी के गीत भोजपुर के किसान-संघर्ष के दस्तावेजी गीत ह।संघर्ष के साक्षी।भोजपुर के  चँवरी,बहुआरा,कुनई,बिहटा,एकवारी से जुड़ल जतना ले घटनाक्रम बा सब प गीत अकारी लिखले बाड़न।संघर्ष के नायक के अनेक छवि उनका गीतन में मौजूद बा।ऊ नायक झोपड़ी में पलल-बढ़ल हाशिया प सदियन से धकेलल समुदाय के हवें जेकरा आँख में मुकुती के सपना बसेला।उनका प बहुत कम लोग के नजर गइल बा।

भोजपुरे के एगो कवि-गीतकार हवें केशव रत्नम।भोजपुरियो में गीत लिखले बाड़न।अरविंद कुमार के संपादन में उनको एगो पुस्तिका छपल बा- ‘केशव रत्नम के गीत’।एह में उनकर हिंदी आ भोजपुरी के गीत छपल बा।जाने के चाहीं कि उनकरो गीत युवानीति के लोग गावत रहे।आज उनकर कवनो चरचा ना होला।1987 से 90 -95 तक बहुते लोग रहे जे आन्दोलन के हमराह रहे आ गीत खूब हुलसि के राजनीतिक कार्यक्रम में सुनावत रहे।ओह में एगो नाँव छबीला जी के इयाद परि रहल बा।ऊ एगो दौर रहे जहाँ आन्दोलन के सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के स्वर आंदोलने के बीच से फूटत रहे।ओह सब लोग के खोजल जरूरी बा।

सुरेश काँटक 1980 के बाद कहानी लिखे के साथे चरचा में अइलें।उनकर एगो मशहूर कहानी ह ‘एक बनिहार का आत्म-निवेदन’।एह नाँव से उनकर एगो कहानी संग्रहो बा।हिंदी के एह कहानी में भोजपुरी के एगो गीत बा — “अब ना करब बनिहरिया ए मालिक/ कम बा मजूरिया।” पता नइखे कि एह गीत के गीतकार के हs।ई गीत हम बहुते छोट रहीं त एगो नाटक देखत खा सुनलें रहीं।जहाँ ले हमरा इयाद परत बा कि एह के शारदा सिन्हा भी गवले बाड़ी।अब का कहीं कि ई जनगीत ह कि लोकगीत ह कि अउर कुछ।देखल जाए कि दुर्गेन्द्र अकारी लिखत बाड़न- “मति करs भाई बनिहारी तू सपन में।”अकारी एगो बनिहार के पीड़ा दोसरा गीत में लिखत बाड़न- “चउरा के बन हम कबहूँ ना पवलीं/ जउवे आ खेंसारी से पिरितिया ए हाकिम।” बहुते अइसन गीत बा जे लोक में प्रचलित बा आ पता नइखे कि केकर लिखल ह।आज अब पता कइल जाए आ एह प बात कइल जाए।सुरेश काँटक के भोजपुरी कवितन के एगो संग्रह बा – ‘का ए बकुला’।एह में जबरदस्त राजनीतिक व्यंग्य बा।ऊ गीतो लिखेलें।सोसल मीडिया प उनकर एगो चइता गीत सुनल जा सकेला।एह के गवले बाड़न बंटू(डी. पी.सोनी), अंकुर आ समता।गीत ह –   “देसवा में बढ़ल बेमरिया हो रामा/ मिले ना नोकरिया।” सोसले मीडिया प चल रहल बा  “कहब त लागि जाई धक से।” इयाद आ रहल बा रमता जी के गीत- ‘हम का करीं’।लाइन बा- “क्रांति के रागिनी हम त गइबे करsब/ केहू का ना सोहाला त हम का करीं।”  ‘लागि जाई धक से’ आ रमता जी के  ‘केहू का ना सोहाला’ प सोचीं जा।रमता जी लिखत बाड़न -‘केहू कोठा अटारी में जलसा करे /केहू टुटही मड़इया में दिन काटता।” आगे बा कि “ना ई ब्रह्मा के टाँकी ह तकदीर में ई त बेईमान धुर्तन के करसाज ह/ हम त अँगुरी देखा के चिन्हइबे करब/केहू जर के बुताला त हम का करीं।” विजेंद्र अनिल लिखत बाड़न- “तहरा बुढियो के तेल आ फुलेल चाहेला/ हमरा नयकी के जरि गइल रुआह भाई जी।” रुआह के मतलब जानेवाला अर्थ के गंभीरता जानत होई।रुआह माने रूह के कामना।मन के चाह।एह तरह के रचनाकार लोग के चरचा कहाँ हो पावेला।एह हालत के तरफ विजेंद्र अनिल इशारा करत बाड़न -“हम कबीर के बानी हमरा पानी कहाँ मिली/ टापू में बइठल बानी राजधानी कहाँ मिली।”

भोजपुरी के गीत प बात के दरम्यान महेंद्र गोस्वामी के नाँव ना आवे त ठीक ना होई।’जब हम आपन हक पा जइतीं / बइठल रवे नियन फुरमइतीं / रउवा हाथ जोड़ घिघियइतीं/ रउवा कइसन लागित जी।” एह के तर्ज प तनी एने-ओने क के कुछ अउरो गीत लिखल लोग।ई कवनो गीतकार के गीत के लोकप्रियता के समझे के एगो जगहो ह।अउरो कइगो गीत बा उनकर।बाकी कुल्हि गीत कहाँ बा, नइखे पता।कुमार विरल उनका प एगो आलेख लिखले बाड़ें जवन ‘भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ के जनवरी 1995 के अंक में छपल बा।शीर्षक बा- ‘दलित समाज के वाचक साहित्यकार महेंद्र गोस्वामी’।गोस्वामीजी लिखत बाड़न- “दुख दे दे नाम रटावेलन/ भगवान बनल बाड़न देखीं/भुखले जे रोज खटावेलन/ इनसान बनल बाड़न देखीं।”

प्रकाश उदय आ शिव कुमार पराग के गीत एह बीचे खूब पसन कइल जा रहल बा।प्रकाश उदय के कई गो गीत नयकी पीढ़ी के कंठहार हो गइल बा।’पति-पत्नी के संवाद के रूप में ‘रोपनी के रँउदल देहिया’ बहुते गावल- सुनल जाला।शिवकुमार पराग के हिंदी के ‘ गर हो सके तो और इक शमा जलाइये/ इस अहले सियासत का अँधेरा मिटाइये ” खूब चरचा में बा।स्वामी अग्निवेश हाले में एह लाइन के एगो बातचीत के अंत में गुहरवलें।उनकर भोजपुरी गीत,गजल,दोहा बहुते अर्थपूर्ण बा।नयकी पीढी में सुमन कुमार सिंह के कुछ भोजपुरी के गीत,कविता आ कहानी अपना देने ध्यान खीचेला।इनकर हाले में एगो हिंदी के कविता के किताब आइल बा- “महज बिम्ब भर मैं”।भोजपुरी गीत के कुछ लाइन देखल जाए -“केहू जाने ना जाने मरम रात के /खून हो जाला सपना सजल रात के।नाहीं सुने सिपहिया अरज कवनो मोर/भोर होखे त पूछे खबर रात के।”

जनगीत आज के दौर में फेर से जगजगा उठल बा।हर धरना-प्रदर्शन में लोग गा रहल बा।फैज अहमद फैज के कइएक गो रचना हजारों लोग के जुबान पर चढ़ि आइल बा।जवन गीत एने कुछ साल से अलोता परि गइल रहे,उहो आज जाग उठल बा।भोजपुरी आज जवन अश्लीलता के फाँस में फँसल बा, खास क के गीतन के मामिला में, ओकर एगो प्रतिवाद जनगीत ह।

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बलभद्र,

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(झारखंड). मो. 8127291103, 9801326311

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