गजल

हम मनई निपट गंवार हईं।

चालीस माडल के कार हईं।

 

बैरी हमसे थर-थर कापें

पर यारन खातिर यार हईं।

 

तलाक के बात कबो न करीं

हम सात जनम के यार हईं।

 

करजा मांगे जो केहू आवे

कही दीह की हम बीमार हईं।

विज्ञापन  बिना चलेला ई

हम जनता के अखबार हईं।

 

आतंकी थर-थर कांपेलं

हम राणा के तलवार हईं।

 

बेकारी  भत्ता दिलवा दीं

देखलादीं हम बेकार हईं।

 

मक्कारी हमसे का करब

“खेतान” से बड़ मक्कार हईं।

 

  • जगदीश खेतान

 

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