ऑक्सीजन से भरपूर ‘पीपर के पतई’

कहल जाला कि प्रकृति सबके कुछ-ना-कुछ गुण देले आ जब ऊहे गुण धरम बन जाला त लोग खातिर आदर्श गढ़े लागेला। बात साहित्य के कइल जाव त ई धरम के बात अउरी साफ हो जाला। ‘स्वांतः सुखाय’ के अंतर में जबले साहित्यकार के साहित्य में लोक-कल्याण के भाव ना भरल रही, तबले ऊ साहित्य खाली कागज के गँठरी होला। बात ई बा कि अबहीने भोजपुरी कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के पहिलकी कविता के किताब ‘पीपर के पतई’ आइल ह। ई किताब कवि के पहिलकी प्रकाशित कृति बा बाकिर ऊहाँ के कवनो परिचय के मोहताज नइखीं। ना कवि अपरिचित बानी ना कवि के कविताई।

कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के ‘पीपर के पतई’ हमके पढ़े के मिलल ह। पढ़ला पर लागल ह कि कवि के अनुभवी नजर जिनगी के हर पन्ना के पढ़ले बिआ। जिनगी उनसे सवाल पूछले बिआ आ ऊ समय के साथे ताल ठोंकत अपना कूबत भर जवाब देहले बाड़ें। जवाबो अइसन कि समय भकुआ गइल होखे। संग्रह के शुरूआते में हमरा जवन लउकल ऊ मन मोह लेहलस। कवि अपना किताब अपना स्वर्गवासिनी ईया, स्वर्गवासिनी भतिजी के साथे आपन पहिलका श्रोता अपनी मलिकाइन के समर्पित कइले बाड़े। ई एगो साधारण बाति हो सकेला बाकीर एहमें असाधारणता ई बा कि पुरुष-प्रधान लोक-जीवन में असामान्य तौर पर नारी के आदर दिहल कवि-धरम के उजागर करत बा।

पेशा से इंजीनीयर आ मिजाज से कवि द्विवेदी जी अपना असीम कल्पना जीवन के डगर पर चलत गाँव-देहात के शब्द-गाँठ लेके बाहर निकलल लागत बानी। द्विवेदी जी के कवितन के देख के हमरा त लागल कि ऊँहा के गंभीर से गंभीर बात के कवनो ना कवनो लोकोक्ति-मुहावरा के ऊपर चढ़ि के बड़ा आसानी से कहि देहले बाड़े। एगो इहे देखीं, –

तुनक के बबुआ मत बतियावा

सभकर अइठन छूटल ।

अइसने घरवा फूटल ।।

द्विवेदी जी के कवितन में पाठक लोग के ढेर अइसन शब्दन से भेंट होई जवन या त भोजपुरी व्यवहार से बाहर बा या उनकर गढ़ल बा आ चाहें कुछे भोजपुरिओ में उनका क्षेत्रीयता के प्रभाव में बा। कई बेर हमरो माथा चकरा गइल कि एह शब्दन के माने का ह, बाकिर भाव से भरल कविताई में शब्दन के बान्हा टूटत लउकल बा। ‘अकड़न’ के एगो उदाहरण देखीं –

जे भी सहकल सहकन छूटी

बेसी अकड़न, ओड़चन टूटी

पेड़ से झरल पतई मातिन

भद्दई पर , त भुभुन फूटी।।

उघरल देह सोहाले नाही, एहनियों के बुझवले जा।

अगर कहल जाव कि ई ‘पीपर के पतई’ भोजपुरी शब्द-संपदा के समृद्ध करले वाला आ ओहके पुनर्जीवन देबे वाला ऑक्सीजन के काम करत बा त कवनों बेजाँय ना होई। हई देखीं ना, कनई, बीगत आदि शब्दन के सुन्नर प्रयोग –

आँखिन से झरत लोर

बोझ नीयन जिनगी

बेखबर बइठल

एक दूसरा पर कनई बीगत

अघा गइल।

समय के टोअत आ समय के साथे चलल कवि के धरम ह। कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी सामाजिक संरचना के एगो हिस्सा हवें। ओह सामाजिक संरचना में राजनैतिक प्रभाव त पड़हीं के बा। राजनीति से दूरो रहल जाव त राष्ट्रीयता खून में त हमेशा उबाल रखबे करी। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद के एगो कविता देखीं –

टभकेले रोज रोज मन के दरदिया

बाबा के नावें से लागे सरदिया

सपनों में मोदिए के

नउवाँ बरइहें ।

अब कइसे बबुआ नमाज पढ़े जइहें।

कई बेर लागत बा कि कवि के कुछ शब्दन के अर्थ देबे के चाहीं। कई बेर ईहो लागत बा कि कवि शब्दन के चयन के चक्कर में ना पड़ि के भाव के व्यक्त करे में रमल बाड़े। हम ई मान के रहि जात बानी कि कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी, से कवि चंदौली जिला से हवें, आ ओहीजा भोजपुरी के शब्दन के कुछ अउरी ढंग से बोलल जाला। कई बेर लागत बा कि भोजपुरी शब्दन के मानकीकरण केतना जरूरी बा आ कई बेर ईहो लागत बा कि हम अपना भोजपुरिए में केतना कमजोर बानी। ‘चूरी चाउर, आछत, मदत, खोरिन, देखय आदि।

अब्बो ले सुपवा बोले ला’ में कवि सामाजिक ताना-बाना में छद्म, द्वेष आ अमरख के सुन्नर चित्रण कइले बाड़े। देखीं –

दिन में खैनी साँझ क हुक्का

भोरे आइल साह क रुक्का

खेती में जब भयल ना कुछहु

अन्नदाता फुक्के का फुक्का

बिगरल माथा डोलेला।

अब्बो ले सुपवा बोलेला।

एगो अउरी उदाहरण देखीं –

मिलत जुलत सभही गरियावत

पगुरी करत सभे भरमावत

पुतरी नचावत मुँह बिरावत

एहनिन के मुँह अब के रोके ।

आन्हर कुकुर बतासे भोंके।

सामाजिक व्यवस्था में वैवाहिक विधान के एगो अलगे महŸव ह। देखीं एगो चित्रण –

केतनों कइल सोआरथ नईखे

इजतियो के समहारत नईखे

लागत बा, बेटवा सहक गइल

देखय न, आस्था बदल गइल।

द्विवेदी जी कई गो कविता व्यक्तिगत रूप से लिखले बाड़े। ऊ कविता व्यक्तिगत का, नितान्त व्यक्तिगत भइला के बादो सामाजिक बान्हा से अलगे नइखे। ‘इमेज के चक्कर’ में जहवाँ दूमुँहा व्यवहार के पीड़ा बा ओही जा ‘उबटल पीर’ में साथी-सँघाती के बातन के चोट बाऽ आ ‘कइसन बहल बेयार’ के अलगे बेयार बा। ‘खग बूझै खगहीं के भाषा’ में किसानीए के पीड़ा नइखे, खराब व्यवस्था से चीढ़ो बा आ ‘खीझल बिलिया खम्हा नोचे’ में रार-ताकरार के साथे ओहसे कुछऊ ना मिले वाला सीख बा। ‘गइल भँइसीया पानी में’ कवि के एगो नव-चेतना के कविता बनि गइल बा। देखीं ना, –

मचल करी ई हाहाकार

करिहें कुल उलटा ब्योपार

मरन अपहरन रहजनी पे

एहनिन के संउसे अधिकार ।

जनता तभियो जै जै बोली

छवनी छइहें रजधानी मे।

ओही तरे के एगो इहो कविता देखीं –

कब्बों जे कुछ भयल खेत में

कहाँ मयस्सर उहो पेट में

सहुआ ले भागल उठवा के

घर में बाँचल धान के पइया।

छुँछा के बा के पुछवइया।।

‘हे नाग देवता! पालागी’ में कवि के पीड़ामय करेजा के चित्रण देखीं। कवि पीड़ा के पीऽ के एगो नया परिभाषा गढ़त लागत बाड़न, –

आस्तीन में पलिहें बढ़िहें

मनही मन परिभाषा गढ़िहें

कुछो जमइहें कबों उखरिहें

गारी सीकमभर उचरिहें

हे नाग देवता! पालागी।

कुछ रचनन में उलटबाँसी के पूट मिलत बा। ‘बहल गाँव बिलाइल खेती’ ओहीसनके रचना बा। एतने ना, एह रचना में गाँव-समाज के रीति-नीति आ नेह-छोह के सथवे सहयोग के भावना के वर्णन बा। समय के साथे अब सबकुछ बदल गइल बा। ना पहिले के नेह बा आ ना पहिले के सहयोग। ओही रचना से एगो बानगी देखीं –

गवईं थाती छोह हेराइल

जाने कहवाँ जा अझुराइल

टूटल गाँछ छुटले बइठकी

नाता रिश्ता सभे भुलाइल

 

काकी अब ना जोरन देती ।

बहल गाँव बिलाइल खेती।।

‘हमरा के विस्तार में बतवनी हँ’ एगो बाप द्वारा बेटा के सामाजिकता के शिक्षा पर रचना बाऽ त ‘बिटिया’ में बेटी के घर के हँसी-खुशी आ खजाना के सुन्नर चित्रण बा। ‘बुढ़ऊ बाबा’ ग्रामीण पारिवारिक विद्रूपता के चित्रण बाऽ त ‘बेपरवाह’ के उठल सुन्नर विषय पर अभीन लागत बा कि बहुत कुछ अउरी कहा सकेला। ‘बेसरम’ के माध्यम से कवि सामाजिक चिंतक के रूप में सजग होत बाड़ें त ‘बेतात के बात’ तनी माथा चकरावत बा। ‘भकुआइल बबुआ’ माटी के छोड़ला के पीड़ा के उकेरत एगो सुन्नर रचना बनल बा। देखीं सभे –

माटी के थाती छोड़ी जब से पराइल बा ।

नीमन बबुआ तभिए से भकुयाइल बा।।

कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी के कविता में सगरो रस के पान हो सकेला। ईहाँ ‘सरस्वती वंदना’ में शारदा माई से दसोनोह जोड़त भक्ति के भंडार बा त ‘बिटिया’ के ईयाद में वियोग वात्सल्य रस बा। ‘अब कइसे बबुआ नमाज पढे़ जइहें’ में देशभक्ति के भाव भरल बा त ‘अब्बो ले सुपवा बोलेला’, ‘इमेज क चक्कर’, ‘मौसियाउर भाई’ आदि में व्यंग्य के बाण बा। ‘महतारी’ कविता में वात्सल्य के रूप देखीं –

आजु निकहे

बिखियाइल बानी माई

बचवन पर

नरियात-नरियात

लयिकवो मुरझा गइलें

आँखिन के लोर थम्हात नइखे

फेरु अझुराइल

नोचब-बकोटब

खिलखिलात, हँसत, मुस्कियात

केतना रंग, केतना रूप।

साँच त ई बा कि आज के मनई कहीं आपन मानवता हेरवा दिहले बा। कवि के अंतिम कविता अइसने मनई के चित्र उकेरत बिआ। देखीं –

इंटरनेट के बजार में, बेजार भइल मनई

हर बेरा गूगल के शिकार भइल मनई।

घरी-घरी टुकुर-टुकुर वेभ के निहारत रहे

छितिराइल वेभ क, औंजार भइल मनई।।

साहित्य खातिर ई एकदम साँच बात हऽ कि सजग आ सफल कवि ओही के मनल जाला जे अपना वातावरण के अनुसार आपन शब्द चयन, भाषा शिल्प आ संप्रेषण-शक्ति के अपने जइसन प्रयोग करेला। सोना त एक्के होला, ई त सोनार के कला हऽ कि ओह सोना से कवन-कवन गहना गढ़ि देता। कवि जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी अपना पहिलकी कृति ‘पीपर के पतई’ के कम शब्दन से बड़का-बड़का बात बड़ी सहजता से कहि देहले बानी। कविता में ऊँहा के मुहावरा-लोकोक्तियन के प्रयोग भोजपुरी साहित्य के एगो नया रास्ता बनावत बा आ नव-ऊर्जा देबे वाला ऑक्सीजन के काम करत बा। ई आॅक्सीजन त निश्चित रूप से कम-से-कम भोजपुरी साहित्य में ना कबो मानवता के मरे दी, ला कबो भाषा के आ ना अपना सभ्यता संस्कृति के। ‘पीपर के पतई’ निश्चित रूप से भोजपुरी साहित्य के फाँड़ में एगो सुन्नर खोंइछा आइल बा। एहके एक बेर पढ़ला के बाद मन अघात नइखे, बार-बार पढ़े के बेचैन होत बा।

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पुस्तक – पीपर के पतई

कवि – जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

प्रकाशन – नवजागरण प्रकाशन

मूल्य – 200

 

-केशव मोहन पाण्डेय

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