चइता

रचिभइया फोनवा लगइतअ हो रामा पिया परदेसिया पिया के नमरवा मिलइतअ हो रामा पिया परदेसिया   जहाँ पिया गइले तहाँ दिन इहाँ रतिया जगलो के फेर से जगइतअ होरामा पिया परदेसिया   कुछ नाहीं कहलीं सुरुज चना सोझवा झुठहीं कोहइला के मनइतअ हो रामा पिया परदेसिया   कुछ नाहीं चाहीला हो कुल्हि सुख संगही मन के बसन्त रितु अइतअ हो रामा पिया परदेसिया   आनन्द सन्धिदूत

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आखिर के ठगाता

शेखर के गांजा के इ पहिलका दम रहे। अवरू सब साथी गांजा के दम पचावे आ जोम से मुँह आ नाक से धुँआ निकाले में माहिर हो चुकल रहन। पहिलके दम शेखर तनि जोर से खींच लेले रहले। उनका से बर्दाश्त ना भइल। उनकर माथा चकराए लागल। बाकि उ अपना साथी लोग से कुछ ना कहले। उनका बुझाइल कि साथी लोग मजाक उड़ावे लागी। जब दुसरका राउन्ड में चीलम उनका पास पहुँचल त उ झूठो के दम खींचे के नाटक कइले। ओकरा बाद उ ओहीजे एगो बँसखट पर ओठंघि गइले।…

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ब्रजभूषण मिश्र आ उनकर रचना संसार

ब्रजभूषण मिश्र कवि, निबंधकार, संपादक, समीक्षक आ संगठनकर्ता होखे का पहिले साफ मन-मिजाज आ दिल-दिमाग के सोगहग मनई हउवें। साफ मन-मिजाज के मनई मतलब सभकरा हित आ चित के खेयाल राखेवाला। घरियो छन जे इनका से बोल बतिआ लेलस ओकरो के पीठ पीछे कहत सुनले बानी – ए जी, एह जुग-जबाना में मिसिर जिउवा अइसन सहज मनई मिलल मुश्किल बा। एकदम से ‘बारह भीतर एक समाना’। गोसाईं जी का सबदन में – सुरसरि सम सभकर हित होई। एही गुन-धरम वाला के बावा जी कहल जाला। इसे सब गुन-धरम त इनका…

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जनगीत आ भोजपुरी जनगीत

जनगीत में जन आ गीत एक साथे बा।एह में जन पहिले बा आ गीत बाद में।एह पहिले आ बाद के जवन मतलब ह तवन ई ह कि जन के कंठ में गीत बसेला,ओकर हिया से गीत फूटेला।जन आ गीत के जुगलबन्दी में पूरा जीवन धड़केला।राग-रंग के साथे विरह-बिछोह,दुख-तकलीफ आ जीवन-संघर्ष।सज्जी समाज मय नाता-रिश्ता के साथे।जनगीत कवनो एगो भाषा आ देश के चीज ना ह।हर देश हर भाषा में पावल जाला।हँ, ओकर रूप आ अभिव्यक्ति अलग -अलग होला आ बहुत कुछ आश्चर्यजनक रूप से मिलतो जुलत होला।जनगीत के हालाँकि एगो खास…

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रोज-रोज काका टहल ओरियइहें!

भीरि पड़ी केतनो, न कबों सिहरइहें.. रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! भोरहीं से संझा ले, हाड़ गली बहरी जरसी छेदहिया लड़ेले सितलहरी लागे जमराजो से, तनिक ना डेरइहें! रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! गोरखुल गोड़वा क,रोज-रोज टभकी दुख से दुखाइ सुख, एने-ओने भटकी निनियों में अकर-बकर, रात भर बरइहें! रोज-रोज काका, टहल ओरियइहे! फूल-फर देख के, उतान होई छतिया छिन भर चमकी सुफल मेहनतिया फेरु सुख-सपना शहर चलि जइहें! रोज-रोज काका टहल ओरियइहें! छोटकी लउकिया, बथान चढ़ि बिहँसे बिटिया सयान, मन माई के निहँसे गउरा शिव कहिया ले भीरि निबुकइहें! रोज-रोज काका,…

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घेरी घेरी बरसे बदरिया

घेरी घेरी बरसे बदरिया बलम नौउकरिया से आई जा हो। बदरा अंगे अंग करेला ठिठोली मारे ला मुस्की बोलेला कुबोली घड़कन जगावे बुजुरिया बलम नौउकरिया से आई जा हो। चुअ ता ओरवन बह ताटे खोरी छुअत हवईया मोहै चोरी चोरी झाँकत घटा अँगनईया बलम नौउकरिया से आई जा हो। देवरा सतावे ला कजरा निहारी ननदी ठिठोली करै खींची सारी भभक ता मन कै डिबरिया बलम नौउकरिया से आई जा हो। केतना कहीं साँच का का बताईं हियरा बहै लोर कईसे देखाईं “योगी” सतावै पिरितिया बलम नौउकरिया से आई जा हो।…

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मांगलिक गीतन में प्रकृति-वर्णन

लोक-जीवन में आदमी के सगरो क्रिया-कलाप धार्मिकता से जुड़ल मिलेला। आदमी एह के कारन कुछू बुझेऽ। चाहे अपना पुरखा-पुरनिया के अशिक्षा आ चाहे आदमी के साथे प्रकृति के चमत्कारपूर्ण व्यवहार। भारतीय दर्शन के मानल जाव तऽ आदमी के जीवन में सोलह संस्कारन के बादो अनगिनत व्रत-त्योहार रोजो मनावल जाला। लोक-जीवन के ईऽ सगरो अनुष्ठान, संस्कार, व्रत, पूजा-पाठ, मंगल कामना से प्रेरित होला। ई सगरो मांगलिक काज अपना चुम्बकीय आकर्षण से नीरसो मन के अपना ओर खींच लेला। एह अवसर पर औरत लोग अपना कोकिल सुर-लहरी से अंतर मन के उछाह…

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हम गाँव क हईं गँवार सखी

हम गाँव क हईं गँवार सखी! हम ना सहरी हुँसियार सखी! बस खटल करीला सातो दिन, आवे न  कबो  अतवार  सखी! हम गाँव क हईं गँवार सखी! लीची,अनार,अमरूद,आम, सांझो बिहान खेती क काम, घेंवडा़,लउकी,धनिया जानी, ना जानीं हरसिंगार सखी!हम गाँव क हईं गँवार सखी! इहवाँ जमीन बा बहुत ढेर, असहीं उपजे जामुन आ बेर, इ गमला में के फूल ना ह, जे खोजे सवख सीगांर सखी! हम गाँव क हईं गँवार सखी! गोबर-गोथार , चउका-बरतन, अंगना,दुअरा सब करीं जतन, दम लेवे भर के सांस न बा, बानीं तबहूं बेकार सखी!…

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बुधिया

गाड़ी टेसन से अबही छूटल ना रहेल सवारी अपने मे अरूझायल हउए । केहू सूटकेस मे चेन लगावत ह,त केहू आपन बेग के सही करत ह,त केहू आपन सीट न. खोजत बा।तबही धच – घचक करत गाड़ी आगे बढै़ लगल । तब ले वहीं मे से केहू क अवाज सुनाईल ,इंजन लग गयील अब गाड़ी थोड़कीय बेर मे चली।चाय ले ला…..चाय।कुरकुरे दस रूपिया….दस। कहत चायवाला डिब्बा में घुसल। अबही गाड़ी अपने पुरे रफ्तार में आवै, बुधिया खिड़की के पास बैइठ गइल।बहरे पलेटफारम छोड़त आगे बढ़त गाड़ी क चाल समझै लगल…

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बरसे बदरिया

नन्‍हीं–सी गुड़िया के गोदिया उठवलैं लोरिया सुनाय नैन निदिया बलवलैं अँगले में झरैला दुलार हो बाबा मोर आवैं बखरिया॥ नेहिया की छँहियाँ में गुनवाँ सिख्‍वलैं बचपन से बड़पन उमिर ले पढ़वलैं नेहिया कै भरल भंडार हो बाबा मोर आवैं बखरिया॥ दुखवा उठाइ धरे सुखवा बिछउलैं हँसि हँसि के सबही के नेहिया लुटउलैं मोहिया भरल बा अपार हो बाबा मोर आवैं बखरिया॥ कविता के रस होला सँझिया बिहनवाँ गउवाँ के गितियन में बसैला परनवाँ गीतन से करैलें सिंगार हो बाबा मोर आवैं बखरिया॥   हरिराम द्विवेदी, वाराणसी

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