चठइल

ओझइती कइके लउटत घड़ी संतजी का खरहुल में चठइल पसरल लउकल। सोंचलन की भीतरा ढुक के देख लिहल जाव जदि दू चार गो भेंट जाई त भात पर का चोखा के जोगार हो जाई। जब ऊ चठइल का लती के उलिट पलिट के देखलन त अचरज में पड़ गइलन। काहे कि हर लतिये में सात गो आठ गो चठइल फरल रहे। ऊ चटकवाही देखावत लगलें तुड़े आ जमीने पर धरे।उनुका मन में एगो डरो रहे कि कहीं एही बीच खरहुल के मउआर आ गइल त चठइल अधिआ लीही।भल भइल केहू…

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