चलीं बात करे के

का जमाना आ गयो भाया,बात करे के परिपाटी फेर से उपरिया रहल बा। बुझाता मौसम आ गइल बा,मोल-भाव करे के बा, त बतकही करहीं के परी। बिना बतकही के बात बनियो ना सकत। ई चिजुइए अइसन ह कि एकरे बने-बिगरे के खेला चलत रहेला। बात बन गइल होखे भा बात बिगर गइल होखे, दुनहूँ हाल मे बात के बात मे बात आइये जाले। हम कहनी ह कि एह घरी मौसमों आ गइल बा,बाकि इहाँ त बेमौसमों के लोग-बाग मन के बात करे मे ना पिछुआलें। जब बात उपरा गइल बा…

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गजल

बहुते के कलम घिस गइल,ढेरे के ना धार अबहीं बाकी बा बहुते के इलाज कइल गइल, ढेरे के उपचार अबहीं बाकी बा   केतनन के पेट भरल बाटे, केतनन के भूख ज्वाला बा लेसले बहुते के लोर बा पोछल गइल, ढेरे के रोजगार अबहीं बा   केतना ना माई जर मर गइली, डोली ना उठल बेटी ना पढ़ली बहुते के हाथे मेंहदी बा लागल, ढेरे के उधार अबहीं बाकी बा   एह देस के हाल गजब बउए, जहँवा के लोग अजब बा कुछ बहुते के दिल हिल मिल जाला, ढेरे…

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मनई आ मच्छर

मनई आ मच्छर दूनो के राशि एके हवे। दूनो मे मात्रा भी बराबर हवे। सोचल जाव त सुभावो एके ह। तबो दूनों मे एक फरक बतावल जाला। मनई बुद्धिजीवी कहाला आ मच्छर परजीवी। हमरा ई दसे आना सही लागेला। मच्छर बुद्दिजीवी ना ह। ई त आठ आना पक्का ठीक बा  बाकि मनई परजीवी न हवे,एकर कवन गारंटी बा। ईमानदारी आ मेहनत-मजूरी करे वाला मनई कहइहे का?इनके जिनगी कवनों जिनगी ह। हूसियार लोग के कहनाम ह कि पइसा दिमाग से कमाइल जाला। मेहनत से त कवनो तरे पेट भरेला। अपने आप…

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केहू खातिर बैंगन पथ्य आ केहू खातिर बैरी

का जमाना आ गयो भाया,फुलौरा के नावों लोग भुला गइल। शहरन मे ओकर कुछ दोसरे नाँव राख़ लेले बा लोग। के जानी दही बड़ा बोले लागल बा लोग। आगु बढ़ला के फेर मे कई बेर जान बूझ बुरबकाह बनेला लोग। एह सगरी बातन के पाछे अगुवा बने के सपना होखेला। बाकि कहाउत त जस के तास बा, अजुवो ढेर लोग बेमतलबो के आपन मुँह सुजा के फुलौरा अस कइले रहेला। ई कवानों जरूरी नइखे कि मुँह फुलौरा अस बनावे के पाछे बाउरे बाति होखों, ढेर हाली लोग नीमनो बाति हो…

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कजरी

डाढ़ि डाढ़ि जइसे पातरी बिजुलिया झूले खाइ के कलइया झूले ना। नैन अलोते छिपाई गोड़े गोड़े गुदराई धाइ बइसि के सहेली के कन्हइया झूले। खाइ के दूनो पल्ला बीने बाँधे गोरी बँहिया नेवाधे आधे ऊन में लपेटली सलइया झूले। खाइ   आनन्द संधिदूत

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कजरी

पवन झकझोरे बालम मोरे। नन्ही नन्ही पनिया के बुनिया पलकिया पर ढोय ढोय बदरी बदन प’ गिरावेले कोंवर अंग टोय टोय हँसले रहउँ ना बरेला गुदरउँना सरब अंग बोरे बालम मोरे। नासा भँहु तानेला अकसवा में बोरो लागे जरत बुतात बा धुआँ धुआँ सोरहो सिंगारवा कि बूँन बूँन अँसुआ झुरात बा लोर झरे अँखिया बरवनी के पँखिया हिलेले कोरे कोरे बालम मोरे। सभ्यता समर काटे चिउटी देखत तोर लाजहीन दुनिया कहीं उड़े पल्ला कहीं अँचरा बदरिया के नीक ना रहनिया चम चम बिजुरी कमलदल अँगुरी फोरेले पोरे पोरे बालम मोरे।…

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सवाल के गठरी

हमनीके देश नया नया सवाल उगावे वाला देश ह । कुछ सवाल त परमानेंट बान स जवन कबो ना बदलेलस, साँच कहल जॉव त हमनीक ओके बदलले ना चाही जा । रउवा इहो कह सकीला की सवाल से लड़ल हमनी क पुरनका शौक ह । लईकिन के आजादी आ पोशाक प सवाल त सनातनी सभ्यता का हिस्सा ह । ओहिजे बेरोजगारी वाला सवाल प बुरबक नियर चुप रहले में भलाई समझी ला जा । खुदे कामचोरी क के भरस्टाचार के शिस्टाचार वाला दर्जा दे के नेताजी के भरस्टाचार के गरियावल…

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ए माई हम ससुरा ना जाइब

ए माई हम ससुरा ना जाइब ननदी नटिन देवरा दरिंदा भसुरा भेड़ुआ करेला खाली निंदा छछबेहर गोतिनिया के बात हम बताइब ए माई हम…………………….   ससुई सनकी ससुरा कमीना मुसकिल करेलेसं हमार जीना कहेलेसं दहेज़ लेके आउ ना त जहर देब चाहे जलाइब ए माई हम………………………   मरदा मुअना रहेला हमसे हट के हरदम मारे कुकुर जस झपटि के अचके फफेंली धके कहेला दबाईब ए माई हम………………………..   कबो ना हटिला दिन भर खटेला तबो ओहनी के काहे अटकिला भोजन के बतिया कइसे भुलाइब ए माई हम………………………..   माई रे…

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चढ़ल उतर गइल

हमार बाउजी जब अपना लइकाईं के बात बतइहें त मन बहुत परसन्न हो जात रहे I लागे फुलझड़ी छूटे हँसी के I  हँसत-हँसत पेट बथे लागे I ओहि बतियन में से आज एगो बाति इयाद आ रहल बिया I चइत बइसाख के महीना रहे I पुकारी बाबा के खरिहानी में गहूँ दवाँत रहे I मोटकी आरी प जगजीतन चा माथ प तेलहन के एगो छोट बोझा लेले आवत रहन I जब  भीरी अइले त माथ के बोझा उतार के बाबूजी से कहले “का हो माह्टर का हाल चाल बा ? सब ठीक ठाक ?  बोलत काहे नइखs, मुँहवाँ…

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व्यंग्य विधा के समर्थ कवि धरीक्षण मिश्र ‘

नैतिकता आचरण के मर्यादा ह आ ई बात व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, शैक्षिक-शैक्षणिक, आर्थिक वगैरह हर एक क्षेत्र से जुड़ल होला। अनैतिकता एह आचरण का मर्यादा के तहस-नहस कर देले। जवना से व्यवहारिक आ वैचारिक हर स्तर पर ओछपन, अव्यवस्था, अराजकता, कुरुपता-विद्रूपता के बजबजात गंहाइल वातावरण बने लागेला। जवना से खिसिआइल,झोभाइल आ घिनाइल कारयित्री प्रतिभा के धनी केहू कवि जब ओकरा स्वरुप, स्वभाव आ कुप्रभाव के उटकेरत-ओसावत अपना कवि-कर्म के विषय बनावेला तब व्यंग्य कविता के जनम होला। कवनो व्यंग्यकार का व्यंग्य काव्य के उद्देश्य व्यवहारिक – वैचारिक अनैतिक…

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