आईं, गुलरी के फूल देखीं नु….?

ढेर चहकत रहने ह  कि रामराज आई , हर ओरी खुसिए लहराई । आपन राज होखी , धरम करम के बढ़न्ती होई , सभे चैन से कमाई-खाई । केहू कहीं ना जहर खाई भा फंसरी लगाके मुई । केहू कबों भूखले पेट सुतत ना भेंटाई । कुल्हि हाथन के काम मिली , सड़की के किनारे फुटपाथो पर केहू सुतल ना भेंटाई , मने सभके मुंडी पर छाजन । दुवरे मचिया पर बइठल सोचत-सोचत कब आँख लाग गइल, पते ना चलल ।  “कहाँ बानी जी” के पाछे से करकस आवाज आइल,…

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अब चरचा होई

तहरा के लागल काहें मरिचा अब चरचा होई। रयन से बाड़s फरीछा-फरीछा अब चरचा होई।   माकत रहला बथता कपरवा लागल बुझाता हर के फरवा तरहत्थी में लउकेला खरचा अब चरचा होई।   जतने अरजी ओतने फरजी चोरी कई  तू बनला दरजी बतिया थोपलकी लागे बरछा अब चरचा होई।   मेढकी कुदान अवते चुनउवा बोकरि आपन गिरवला भउवा लगता अब फाटी जाई परचा अब चरचा होई।     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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