भगवती प्रसाद द्विवेदी के राजभाषा विभाग के ‘भिखारी ठाकुर पुरस्कार’

बलिया के मूर्धन्य साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी के बिहार सरकार के राजभाषा विभाग का ओर से  वर्ष 2020 के भिखारी ठाकुर पुरस्कार दीहल जाई। भगवती प्रसाद द्विवेदी जी हिंदी आ भोजपुरी के वरिष्ठ साहित्यकार बानी। हलिए उनुकर एगो संपादित पुस्तक पुस्तक ‘महेन्दर मिसिर के चुनिंदा भोजपुरी गीत’ के  प्रकाशन सर्वभाषा ट्रस्ट कइलस ह । भोजपुरी साहित्य सरिता परिवार का ओर से उनुका अनघा बधाई।

Read More

ग़ज़ल

रात अन्हरिया, दिया जराईं, डगर डगर उजियार करीं बहुत सरहनीं महल के रउआ, अब मडई से प्यार करीं   सागर के पानी ह खारा, एह में डुबकी लिहले का ताल तलइया वाला पानी, गंगा जी के धार करीं   देखीं दुःख के दानव छउकी, छउकी रार मचवले बा भूख का मारे के पहिले, ओकरा छाती पर वार करीं   सांच हवे जब देहिया, माटी के ह माटी मिल जाई तब देरी का, माटी मिल के भी उनकार उपकार करीं   साहस के लहरइले, परबत के हियरा भी दरकेला बखत पड़े…

Read More

बेटा बेचा गइल

समधीजी हम रउआ गोड़ पो पगरी राखत बानी हमरा बेटी के अपना लिहीं , भोला हाथ जोड़के अपना होखेवाला समधी के आगे गिड़गिड़ाये लगलन। देखीं हमरा के समधी मत कहीं अभी शादी नईखे भइल त इ नाता कइसन दीनदयाल रोब में बोललन।फिर हाथ जोड़के भोला कहलन , शदिया तऽ होइये नु जाई राउर कृपा के खाली जरूरत बा।देखीं जवन तय बा तवन तिलक चढ़े से पहिले किलियर कर दिहीं हम कहाँ कहत बानी कि शादी ना होई दीनदयाल कहलन। देखीं हम बहुत फेरा में अभी बानी पइसा के कवनो इंतजाम नइखे…

Read More

गजल

लैला के मजनू, हीर के, राँझा के लाग-बाझ | बाजत मजीर ढोल बा, कान्हा के लाग-बाझ ||   सोहनी के प्रीत-रीत, महीवाल के अबूझ | एक-एक चिराग नेह के, नाता के लाग-बाझ ||   जिनगी के नेह-छोह के, फरहाद यार के | अपना सबूरी, साधना, श्रध्दा के लाग-बाझ ||   जुलियट के, रोमियो के, आ खुसरो निज़ाम के | दमयन्ति, आम्रपाली के, अरजा के लाग-बाझ ||   जौहर गजल का गाँव में, चिंतन श्रृंगार के | तुलसी, कबीर, जायसी, मीरा के लाग-बाझ|   -डॉ.  जौहर शफियाबादी

Read More

अंजुरी भर अंजोर

ए चान अंजोर कई द उग के रात,भोर कई द।   लरकोरि के लरिका रोवे टुकुर टुकुर सरग निरेखे माई गावे मीठी लोरी तबो ना उ सोवे चांदनी से बिभोर कई द ए चान अंजोर कई द।।   दिन में काहे छिप जाल बोल केकरा से डेराल रात में आके तनि के करे ल तारन प राज आजु काहे बाड़ लुकाईल कबेसे दे तानी आवाज।   तनिका तु धेआन देई द दूर आँख से लोर कई द उग के रात,भोर कई द ए चान अंजोर कई द।।   परेम आपन…

Read More

देखनी हम शमशान में

देखनी हम शमशान में, का आमिर रहे का गरीब धधके लागल अगिया, पाचतत्व में मिलल शरीर   ना माई ना बाप ना भाई, ना साथे रहे परोसी ओकरो के साथे न देखनी जेकरा के देहनी रोटी   जरत रही गइल देह सगरो जबले देह राख न भइले अब पछ्तइले का होई जब समय बीत के साथे अइले   दुनिया के पचरा में परि के हमहू समय गवाइले पर केहू से कईल वादा सांस तक निभाईले   आखिर एक दिन उहे रहिया, सबका खातिर राखल बा जईसन करम रही सभकर ओहिसन…

Read More

चम्पारण के जन कवि स्व.बृज बिहारी प्रसाद ‘चूर’

चंपारण के सुप्रसिद्ध कवि बृजबिहारी प्रसाद चूर(23 जनवरी 1914-) के भोजपुरी कविता- “चंपारण के लोग हँसेला” (1954 ई में प्रकाशित)चंपारण के महिमा के बखूबी बखान करत बा, रउरा सभे आनंद लिहिन- चंपारण के लोग हँसेला. हम बता दिही कि बृजबिहारी प्रसाद ‘चूर’ वइसे त ‘चूर कवि’ से प्रसिद्ध रहीं . चंपारण में  जनकवि के रूप में ‘चूर जी ‘ के प्रसिद्धी रहे, रहे  काहे  ना जे  आपन साहित्य साधना आम जन, आम  मनई, आपन  माई  भाषा भोजपुरी आ आपन जनम  भुई ‘चंपारण’ के खातिर कइले  होक, जेकर कविता अबाल वृद्ध…

Read More

गीत

गूहि-गूहि टांग दीं अंजोरिया के पुतरी लछिमी गनेस के असीस घरे उतरी। एगो दिया गंगा जी के एगो कुलदेव के एक गउरा पारबती भोला महादेव के एक दिया बार दिहअ तुलसी के चउरी। सासु के ननद के समुख बूढ़ बड़ के गोड़े गिर सरधा समेट भूंइ गड़ के खींच माथे अंचरा लपेट खूंट अंगुरी । लाई-लावा संझिया चढ़ाइ बांट बिहने अन्नकूट पूजि के गोधन गढ़ि अंगने गाइ-गाइ पिंड़िया लगाइ लीप गोबरी । धनि हो अहिन्सा हऊ पाप-ताप मोचनी घर के सफाई मुए मकरी – किरवनी लोग पूजे अंवरा खिआवे सेंकि…

Read More

गजल

लोहा उपजा के लकाहार दिहलऽ जिनगी अँसुआ के धार के बेकार दिहलऽ जिनगी   पिरितिया के खेतवा में बएर भाव बो के हँसुआ के धार के बेकार दिहलऽ जिनगी   नेहिया के थान में दिआला जहँवा सरधा सुसुम तूँ पानी के बेकार दिहलऽ जिनगी   सुधिया के तला से, निहारेला ना ललसा हलचल के जिनगी बेकार दिहलऽ जिनगी   साँझ के बसेरवा में बंसिया के ना टेरवा लोरवा के धार के बेकार दिहलऽ जिनगी   विद्या के गँउआ में नेहिया के का कहानी छछनत इजहार के बेकार दिहलऽ जिनगी।  …

Read More

ना एने के ना ओने के

अपने ही देशवा में भइनी बिदेशिया रे जाके कहाँ जिनिगी बिताईं ए संघतिया I   खेत खरिहान छूटल, बाबा के दलान छूटल दिल के दरद का बताईं ए संघतिया I   तीज तेवहार गइल, जियल मोहाल भइल मनवाँ में घूलत बा खँटाई ए संघतिया I   दक्खिन में दूर दूर, उत्तर में मार मार कहाँ जाके हाड़वा ठेठाईं ए संघतिया I   गाँव घर मुँह फेरल, नाहीं केहु परल हरल रोकले रुकत ना रोवाई ए संघतिया I   एहिजे के भइनी ना ओहिजे के रहनी रे मन करे फँसरी लगाईं…

Read More