रंगदार हो गइल

रंगदार हो गइल मोरा गाँव के लल्लू.   ठेलठाल के इंटर कइलस बीए हो गइल फेल रमकलिया के रेप केस में भोगलस कुछ दिन जेल   असरदार हो गइल मोरा गाँव के लल्लू.   खादी के कुरूता पयजामा माथे पगड़ी लाल मुंह में पान गिलौरी दबले चले गजब के चाल   ठेकेदार हो गइल मोरा गाँव के लल्लू.   पंचायत चुनाव में कइलस नव परपंच समरसता में आग लगवलस चुनल गइल सरपंच   सरकार हो गइल मोरा गाँव के लल्लू.   डॉ. हरेश्वर राय सतना, मध्य प्रदेश

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तनी बरिस$ ना

तनी बरिस$ ना बदरा कचरि के. गरमी डललसि बेमार, हो के बहुते लाचार, करीं तहसे गोहार हम लचरि के. तनी बरिस$ ना बदरा कचरि के. अउसत बा, रात – दिन छूटे पसेना सूखे ना, केतनो हँउकला से बेना धरती भइली अंगार, जरे अंगना दुआर, जान मारत हमार बा जकड़ि के. तनी बरिस$ ना बदरा कचरि के. तनिको सहाता ना तन पर के सारी दहि जाला बिंदिया का रूपवा सँवारीं क द$ अइसन बौछार, भरि जा नदिया ईनार, लोगवा जा ओह पार सब पँवड़ि के. तनी बरिस$ ना बदरा कचरि के.…

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गयल गाँव जहाँ गोंड़ महाजन

का कहीं महाराज , समय के चकरी अइसन घूमरी लीहले बा कि बड़ बड़ जाने मे मुड़ी पिरा रहल बा । जेहर देखी ओहरे लोग आपन आपन मुड़ी झारत कुछहु उलटी क रहल बा । उल्टी करत बेरा न त ओकरे जगह के धियान रहत बा , न समय के धियान रहत बा । एतना लमहर ढंग से आत्ममुग्धता के शिकार भइल बा कि पूछीं मति । ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के जाप मे जुटल फेसबुकिया बीर बहादुर लो अपने आगा केहू के कुछहू बुझबे ना करे, फेर चाहे समने केहू होखो…

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गजल

चमत्कार बा , हाला नइखे तनिकों गड़बड़झाला नइखे ई विकास के राज सड़क ह कहवाँ ऊँचा – खाला नइखे कवानों अइसन जगह बताईं जहवाँ हवस – हवाला नइखे छोपनी नइखे केकरा आंखे किनका मुँह पर ताला नइखे चान सुरूज़ उनके घर कैदी एने कहूँ उजाला नइखे कवन गली, कवने चौराहे जमकल बजकत नाला नइखे जेने कोड़ी , तेने पाईं कहवाँ घूस घोटाला नइखे ॥   गंगा प्रसाद ‘अरुण’

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गजल

चंचल आ शालीन हवा यादन मे तल्लीन हवा हिरनी अइसन मांके – भागे जल मे जइसे मीन हवा परी लोक के किस्सा कहनी के लागे कालीन हवा सन्नाटा से ई बतिआवे बाजे जइसे बीन हवा जबे उड़ासे पंछी उतरे झपटे बन शाहीन हवा फुफुकारत तन मन से जइसे हो जाये आलीन हवा दवा दुआ अस राहत बाँटे कह जाले आमीन हवा ॥ गंगा प्रसाद ‘अरुण’

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गजल

पहिले रSहे सरल आ सहज आदमी आज नफरत से बाटे भराल आदमी ॥   गीत जिनगी के गावत – सुनावत रहे अब तs जिनगी के पीछे पर्ल आदमी ॥   आदमी जे रहित तs करित कुछ सही आदमी के जगह बा मरल आदमी  ॥   अपना वइभव के तिल भर खुसी ना भइल देख अनकर खुसी के जरल आदमी ॥   राण – बेवा भइल अब त इंसानियत माँग मे पाप कोइला दरल आदमी ॥   कब ले ढोइत वजन नीति के ज्ञान के फायदा जेने देखलस ढरल आदमी ॥…

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गजल

मुंह कहे के त का का कह गइल पर मन क बात मने में रह गइल । न नौ मन भइल न राधा नचली जवन जोगवले रहीं उहो बह गइल । दिल के भड़ास निकल ना पवलस भितर के टीस भितरे सह गइल । सांच के गठरी ढो के का कइलीं झूठ बोले वाला के सब लह गइल । जवना खातिर अब ले धधाइल रहीं महल सपना के आज ढह गइल । आग फइले में देरी ना होला कबो देख चिंगारी कवना जगह गइल । लागे अरमान कबो ना पुरा…

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ललका गुलाब समानान्तर भोजपुरी सिनेमा के लिए पहल

भोजपुरी के विरोध का सबसे आसान तरीका है भोजपुरी फिल्मों का विरोध।भोजपुरी के गीतों का विरोध।भोजपुरी फिल्मों की यात्रा निरन्तर ह्रास और छीजन की कहानी है।गंगा मइया तोहें पियरी चढइबों जैसी साफ सुथरी और भावात्मक और बेहद पारिवारिक फिल्म से होकर भोजपुरी फिल्म की पतन गाथा निरहुआ और उसके आगे तक जाती है ।दुर्भाग्य यह कि कुछ भोजपुरी विरोधी लोग ,जिनमें हिन्दी के कुछ विद्वान (?) भी शामिल हैं जो इस पतन गाथा को ही भोजपुरी की असली पहचान बताकर अपना व्यवसाय चला रहे हैं।जब भोजपुरी विरोध के लिए बाजार…

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मति मारीं हमके

ओई दिन माई घर की पिछुवाड़े बइठि के मउसी से बार झरवावत रहे। तवलेकहिं बाबूजी आ गइने अउर माई से पूछने की का हो अबहिन तइयार ना भइलू का? केतना टाइम लगावतारू? माई कहलसि, “बस हो गइल, रउआँ चलिं हम आवतानी।” खैर हम समझि ना पवनी की कहाँ जाए के बाति होता। हम लगनी सोंचे की बिहाने-बिहाने बाबूजी माई के लिया के कहाँ जाए के तइयारी करताने। अरे इ का तवलेकहिं हमरा बुझाइल की मउसी त सुसुक-सुसुक के रोवतिया। हम तनि उदास हो गइनी काहें की हमरा लागल की मउसी…

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“छापक पेड़ छिउलिया त पतवन गहबर….”

लोक साहित्य मे भारतीय सां स्कृति क छवि देखकै मिलै ले। समाज के सब रूपन से परिचित करवालै।आज के समय में जहाँ सम्बन्धन क कउनो मान ना रहि गयल बस रस्म अदायगी तक उहाँ जरूरी हो जाला हमने अपने परम्पराअउर लोक व्यवहार पर चिन्तन कयल जाय।काहे से कि आजकल एकर लोप होत जात बा।लोक जीवन में सामाजिक धार्मिक आथिर्क पझ क छटा देखेके मिलेला। आज भी गाँवन में सयुंक्त परिवार क बोलबाला बा सब लोग एकसाथ एक घर मे रहैनै,हमरे इहाँ लोकगीत मे आदर्श सम्बन्ध क रूप देखैके मिलेला। पति…

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