हाली – हाली उग ये अदितमल

भारत के धरती तीज आ त्योहारन  के धरती ह । इहवाँ हर मौसम मे कवनों ना कवनों त्योहार पड़बे करेला । देवारी के बीतते आउर भाई दूज के बाद सगरो छठ परब के तैयारी चले लगेला । छठ बरत भगवान सूर्य के समर्पित एगो अइसन बरत ह जवन शुद्धता , स्वछता आउर पवित्रता के संगे मनावल जाला । जइसे–जइसे छठ बरत के दिन नीयरे आवेला , जेहर देखीं, ओहरे छठ के तइयारी शुरू होत दिखाई देवे लगेला । छठ के बाति के साथे अपने सभ्यता-संस्कारन के झलक उभरे लागेले ,…

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घरे-घर खुशियां मनाव,दीया खुशी के जलाव

घरे-घर खुशियां मनाव,दीया खुशी के जलाव घरे-घर खुशियां मनाव, बात अब ई फइलाव धरा बचावे खातिर बबुआ,अब त तू आगे आव अब ना छोड़ बम पटाखा, कीरिया आज उठाव दुखियन के गले लगाव… दीया खुशी के जलाव घरे-घर खुशियां मनाव………. ना खाएब ,मेवा मिठाई, ना खाएब बाजार के आपन घरे बनाएब आज,रोकब भ्रष्टाचार के बिजली के खूब बचाव… दीया खुशी के जलाव घरे-घर खुशियां मनाव……….. दीन दुखी गरीब के साथे, बाटंम खुशियां दू चार जेतना संभव होई भइया, देहब हम लार दुलार बूढवन के गले लगाव… दीया खुशी के जलाव…

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अँधेर पुर नगरी….!

का जमाना आ गयो भाया,सगरी चिजुइया एक्के भाव बेचाये लगनी स। लागता कुल धन साढ़े बाइसे पसेरी बा का। कादो मतिये मराइल बाटे भा आँखिन पर गुलाबी कागज के परदा टंगा गइल बा,जवना का चलते नीमन भा बाउर कुल्हि एकही लेखा सूझत बाटे। मने रेशम में पैबंद उहो गुदरी के। मने कुछो आ कहीं। मलिकार के कहलका के आड़ लेके आँखि पर गुलाबी पट्टी सटला से फुरसते नइखे भेंटत। मलिकार कहले बाड़े, ठीक बा, बाक़िर समय आ जगह का हिसाब से कुछो कहल आ कइल जाला। अपना लालच में मलिकारो…

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कुल्हि हमरे चाही

हमही त बानी असली राही कुल्हि हमरे चाही।   हमही से उद्गम हमरे में संगम धमकी से करब हम उगाही कुल्हि हमरे चाही।   हमरे से भाषा हमरे से आशा छपि के देखाइब खरखाही कुल्हि हमरे चाही।   हमही चउमासा बुझीं न तमासा खम खम गिरिहें गवाही कुल्हि हमरे चाही।     जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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तनि दूरे रह मर्दे…….?

का जमाना आ गयो भाया, सोसल डिस्टेन्सिंग के मतलब बता-बता के सभे पगला गइल बाकि केहू माने आ बुझे के तइयारे नइखे। के-के नाही लागल समुझावे में, बड़का भइया से लेके छोटका भइया तक, बबवा से लेके मोटा भाई तक, भुंअरी काकी से लेके मनराखन पांडे तक बाकि ई ससुर के नाती लो समझते नइखे। एह लोगन के एगो बेमारी धइले बा जवना के नाँव सबूत ह। जब ले दू -चार जने एन्ने-ओन्ने ना होखिहें, मनबे ना करी लो। दोसरकी लहर में कई लाख लो मर-बिला गइलें बाकि लोगन के…

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ए बाबू ! सपना सपने रहि जाई

का जमाना आ गयो भाया, अब त उहो परहेज करत देखाये लागल जे रिरियात घूमत रहल। आजु के समय में जब हिंदिये के ओकत दोयम दरजा के हो चुकल बाटे, त अइसन लोगन के का ओकत मानल जाव। हिंदियों वाला लो अपना बेटा-बेटी के अंगरेजी ईस्कूल में पढ़ावल आपन शान बुझता काहें से कि ओहू लोगन के नीमन से बुझा चुकल बा कि हिन्दी से रोजी-रोटी के गराण्टी भेंटाइल मोसकिल बा। हिन्दी के लेके जवन सपना रहे, उ ई रहे कि ई अङ्ग्रेज़ी के स्थान पर काबिज होई। बाकि अइसन…

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आपन ढेंढर भूलि दोसरा के फुल्ली निहारे के फैसन

का जमाना आ गयो भाया, एगो नया फैसन बजार में पँवरत लउकत बा, ढेर लो ओह फैसन ला पगलाइल बा। उचक के ओह फैसन के लपके खाति कुछ लोगन के कुटकी काट रहल बा। एह फैसन के फेरा में हर जमात के कुछ न कुछ लोग लपके ला लाइन लगवले देखात बा। कुछ लो लपकियो चुकल बा। एह फैसनवा के लपकते लोगन के चरचा होखे लागत बा। मने मुफ़ुत में टी आर पी के कवायद। ई कुछ चिल्लर टाइप के लो बा भा रउवा चिरकुट टाइप बूझ सकेनी, एह फैसन…

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अनुवाद के बाद के माने-मतलब

का जमाना आ गयो भाया। कुछ दिन से में/से के चकरी घूमे शुरू भइल बा। बाक़िर ई चकरिया के घूमलो में कुछ खासे बा। जवन आजु ले मनराखनो पांड़े के ना लउकल। ढेर लोग कहेलन कि अइसन कुल्हि काम पर मनराखन पांड़े के दिठी हमेशा जमले रहेले। अब मनराखनो बेचारे करें त का करें। उनका के आजु ले ई ना बुझाइल कि भोजपुरी में बयार मनई आ गोल-बथान देखि के बहेले। एक्के गोल में कई सब-गोल बाड़ी स, ओहिजो हावा के गति परिभाषा के संगे बहेले। जहवाँ एक गोल के…

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गीत

सुना ए!  बाबू भइय्या, सुनी न  काकी  महतारी जग में फइलल बाटे, कोरोना के देखीं महामारी     सर्दी जुखाम फीवर,  बाटे एकर लच्छन गरवा में चुभे बहुत,  दम फूले  छन छन छुवला से फइलत बाटे, अइसन बीमारी जग में फइलल………….     कउनो इलाज नइखे,  ना कारगर दवाई जेके लग जाई भइय्या, बचहु  नऽ  पाई घरवे में दुबकल रहीं, जान  जदि प्यारी जग में फइलल………     सारा जग लाचार भइल, डरे लोग, लोग से जाने कतना जान गइल, कॅरोना के रोग से सोची  डरे  सभै  इहे,  अगला केकर बारी…

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जोन्ही के बियाह

रोज के तरह आज भी बटुन चाचा अपन सब्जी के ठेला पर के समान बेच के घर लौट के चपाकल पर मुंह हाथ धोवत रहे. उनकर मेहरारू किचन में से जाके उनका खातिर भोजन तैयार कर के लियाइली. दिनभर के हारल थकल बुटन चाचा टबुल फैन के पास बैठ के ठंडा ठंडा हवा की लुफ्त उठावे लगले. उनके हृदय में ई वक्त जवन शकुन रहे ऊ ठीक उलटा उनका घर में धीरे धीरे अशांति अपान पैर पसारे लागल रहे जवना के ऊ दूनो मियाँ बीवी के अंदाजा भी ना रहे.…

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