साधो, अब न रहब यहि गाँव

हियाँ उमर भरि रोध हजारन, पग-पग कूकरहाँव। गोबर गउआँ बात न बूझसि चमगीदर मग धावसि, उरझि-पुरझि मरि जासि बावरा अंतभेद नहिं पावसि। निपट फरेबी सियरन के सुर छेद रहल गहिराँव। सिधवा के तिल-तिल मउअति बा, टेढ़िया फरे फुलाय, थोपल जाय तबेला माथे, बानर केरि बलाय, न्याव टकौरी दोल्हा खेले, उल्टे-सीधे दाँव। जटहा बरगद पात चोरावल, तरकुल मन अगराइल, बन-बबूर करइल गाछी के, रूखर तन गदराइल। अमराई में कउआ कुल के मचल गदर गुहराँव। कोइलि का गइहें मनसाइन? करुई बोलि बढन्ती, कहवाँ फूल कटेरी चम्पा, फफसत जाय बिजन्ती। धुन-सुबास-दृग-तिसना मूअल, मरघट…

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