कुररे काग भदेस

अब के सगुन कही मोरी सखिया, कुररे काग भदेस। ना अँगनइया गाछि चनन की, सास-ननद परबीना। कबके मरल आँखि के पानी लोक लाज कतहीं ना, ईरिखे गोतिन जरि न बुताली, उलटा सब परिवेस। बनटेसू की छाँहि कटीली असबस जिया बुझाला। भुतहा पीपर छाँहि चुरावे, बरगद उमटा जाला, बिरिछ-बिरिछ पर बदुरी झूले उलटपंथ दरवेस। बिसर रहल गनगौर महादे’ मनता कवन पुजावे। सबहीं ढेल-ढुकुर महँकारे, परले पीठ खुजावे, नदियन के अमरित पानी में, माहुर केरि अनेस। खर-खरिहानी दंड मुसरिया परल बढ़ावन ताने। बिसुनचुटकिया केहु न बूझे पवनी-जन के जाने? भूखे पेटे आल्हा…

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