चार यार

चार गो यार रहे लो, रामु, कालु, बिकेश, शेरु। सब लोग आपन आपन बात हकले रहे लो..। रामु कहलन,”ए यार हमरा भीरी गाड़ी बा, घर बा, दुआर बा, तहरा लोग के लगे का बा”। अब कालु कहलन, ” ए यार लोगन, हमरा लगे खुब रुपया बा, पइसा बा,तहरा लगे का बा”। अब बिकेश के बारी रहे, उ कहलन, “ए यार सुन सन , हमरा लगे पढ़ाई बा,ज्ञान बा, हम कुछउ कर सकीला, तहरा लगे का बा”। अब लास्ट में शेरु के बारी रहे। शेरु आपन शर्ट के बटन खोललन, तब…

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बुढौती के दर्द

बुढौती के दुख दर्द कहले मे का बा। येंहर बाटे खाई आ ओंहर कुआं बा। अइसन पतोहियन से पाला पड़ल बा कि भरपेट खइलहू के लाला पड़ल बा। हमन के कोठरिया करे के सफाई कहीं कुड़ा बा कहीं जाला पड़ल बा। बेटवा बहुरिया कूलर मे बा सूऽतल आपन ओसरवे खटाला पड़ल बा। बोल कुछ त बोले बा बुढवा सठिआइल न बोलऽ त कहीहं मुहें ताला पड़ल बा। दस रूपया बबुआ से मांगऽब त बोलीहं कमाई ना बाटे निठाला पड़ल बा। जगदीश खेतान

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गवन राग

मनबेदिल ह साँझ, हवा ठिठकल अस, गाछि-बिरीछ उतान, ऊपरे कुहर भरल। हिरना हिय हारल, भयगर रन-बन, राह-बाट अनजान, आसते तम उतरल। कौने खोह-खलेटी में, दरिया दलदल में, पता न कौनि मुड़ान, विघाती बयर परल। बस ले दे कुछ सेस, रात अनजानी संगी, फिर फजिरे मुलुकान, गवन के राग तिरल। दिनेश पाण्डेय, पटना।

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