विवाह गीत-लोकमन की आकांक्षा अवरी आशंका

अनादि काल से ही लोक-मन के इच्छा-आकांक्षा, आशा-विश्वास आदि के अभिव्यक्ति लोकगीतन में भइल बा। ये गीतन में लोकमन के आकांक्षा यदि आसमान छुवले बा, त ओही की बीच से न जाने कब आशंका भी सिर उठा लिहले बा। मानव-मन जब भी शंकालु होता तब-तब आशंका उत्पन्न होला। हर काम के पूर्णता-अपूर्णता, सपफलता-असपफलता के बीच आशंका के एगो झीन तार दिखायी देला। ओ झीन-तार के हटा दिहले की बाद जन-आकांक्षा आसमान से बात करे लागेली। जीवन की पूर्णता खातिर सगरो मानव-जाति में विवाह संस्कार सम्पन्न कइल जाला। ए संस्कार की…

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ई हौ हमार बनारस

इतिहास अउर अध्यात्म क अगर बात करल जाय त काशी के भारत क सबसे पुराना नगर कहल जाला | काशी ऊ नगरी हौ जहाँ भारतीय संस्कृति अउर संस्कार क फुलवारी अबही तक लहलहात हौ जबकि भारत में हर जगह ही पश्चिम के देशवन क असर खूब चऊचक देखात हौ | गंगा नदी के किनारे बसल काशी क विस्तार काशी के पवित्रता क कहानी कहला | न खाली हिंदुस्तान बल्कि विश्व के कोने कोने से लोग इहाँ घूमअ,पढ़अ,लिखअ आवलेन और इहाँ कुछ दिन रहअ के बाद एहि शहर के रंग में…

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कासी कबहूँ न छोड़िये

” कइसन लगल हमार बनारस ए बचवा ? कवन-कवन घाट घुमला ह।कासी कोतवाल बाबा क दरसन कइला ह ? बाबा बिसनाथ जी क दर्शन त ठीक से मिल गयल ह न ? ढेर धक्कम-धुक्की त ना न रहल ह ?” गदगद् कंठ अउर भर-भर नयन पूछत रहलन बुढ़ऊ बाकिर बचवा खुनुसन कुछ बोलत ना रहलन बाकिर कुछ कहे के फेर में उनकर होठ तनी – तनी देर में फड़क जात रहल। ” काहें दिक्कत -परेशानी में  देखात हउवा बचवा।कुछ भयल ह का ?” अपने बनारस क बखान सुने खातिर कान…

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किताब

बरहवीं क रेजल्ट आवे वाला ह किसना सुबेरेवै से भीतर-बाहर करत बा,खन मे कक्का केहन त खन मे माई केहन,मन ही मन आगे का होई यहू बात से डेरात ह,फेल त ना होइब,लेकिन अच्छा रिजल्ट आ जायी त विश्वविद्यालय में पढ़ब हे बजरंग बली निकै सबद सुनाया। रजवा घराने क रघवा समने से आवत देखायल,हे किसना कहवाँ जात हउए,!चल जल्दी चल रिजल्ट निकल गयल हउए।चट्टी पर चलल जाय वही अखबार आयल होई, चल दउड़ के चल।किसना अउर रघवा एक सांस में चट्टी पर पहुंच गइनै, दूनो अखबार में मूड़ी गड़वलै…

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अइहें नू चान

कब अइहें अटरिया प चान कि मनवाँ झवान हो गइल। अँगना में आस के बिरवा लगवलीं। कतिने ना लोभ-मोह जुगत जुगवलीं। पसरल हजारन बितान, त छतियो उतान हो गइल। पारि रेघारी रचेलीं असमनवाँ, खँचियन जोन्ही आँकीं, सीतल पवनवाँ, अगनित सपन उड़ान, सभनि के जुटान हो गइल। घरियो भ चुरुआ में सुख का समाला? जतिने समेटीं तले गरि-गरि जाला। भइल ह मन हलकान, सँचलको जिआन हो गइल। कारी अन्हियरिया के अनगुढ़ बतिया। रहता अजानल ह पगे-पगे घतिया। साँसत में परल परान, जिनिगिया धसान हो गइल। कब अइहें अटरिया प चान कि…

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हिन्दी दिवस समारोह में पुस्तक विमोचन, परिचर्चा आ कविता के सरिता बहल

आजु 14 सितंबर संझा हिन्दी दिवस का उपलक्ष में “सुभाष वादी समाजवादी पार्टी गाजियाबाद” का कार्यालय पर “हिन्दी: कल आज और कल” पर परिचर्चा आ काव्यगोष्ठी के भव्य आयोजन सम्पन्न भइल, जवना में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक श्री वास्तव जी समारोह अध्यक्ष रहलें आ अभिनंदन तिवारी जी कार्यक्रम के अध्यक्षता कइलें।प्रमुख वक्ता कवि और लेखक आदरणीय मोहन द्विवेदी जी आ भाई सतेन्द्र यादव जी हिन्दी के स्वतन्त्रता आंदोलन से लेके आज तक का स्थिति पर आपन विचार रखलें। गौतम बुद्ध नगर की कला व संस्कृति प्रकोष्ठ की अध्यक्षा कवयित्री श्रीमती ममता सिंह…

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