सरस्वती बंदना

जय हो मइया शारदा, होसवा बिसारी द। हम निरगुनिया अधम अभिमानी तोहरी किरितिया के कइसे बखानी मोह अगियान सब जरी से उजारी द। जय —   अरगवों के गोदी मे उठवलू नाही जानी हमरा के काहे बिसरवलु कि हमरो के खोली के पलकिया निहारी द। जय —   केहु ना सहायी माई तोहके पुकारी राति दिन तोहरे डगरिया निहारी कि हमरो दुआर कबों हंस के उतारि द। जय —   चारु ओर छवले गहन अंधिअरिया जाईं कहा सूझे नाही कवनों डगरिया कि हिया बीचे दिया तनि ज्ञान के तू बारि…

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