ग़ज़ल

चलीं जी आजु में एक बे फेर से जिअल जाव। मिलल बा जवने जिनिगी मज़ा खुब लिहल जाव। मिली का दोसरा से आपन दुख दरद बता के, दरद के जाम बना के आईं घट घट पिअल जाव। बेयार ओरिये बहि के लय में लय मिला लीं जा, उल्टा चलि के सभका से मत दुशमनी लिहल जाव। दोसरा के फाटला फुटला से हमनीं के का मतबल जुगाड़ क के आपन फाटल कसहुँ सिअल जाव। मुड़ी ममोरि के चाहे शरम के खोरि के धरीं, दान पुन क के हँसी खुशी लोग से…

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कजरी

बदरी आवऽ हमरी नगरी, नजरी डगरी ताकति बा। सूखल पनघट, पोखर, कुइयाँ असरा गिरल चिताने भुइयाँ छलके नाहीं जल से गगरी, नजरी डगरी ताकति बा। बूढ़ लगे सब बिरिछ पात बिन ठठरी सेवे दिनवाँ गिन-गिन अइतू फिनु बन्हि जाइत पगरी, नजरी डगरी ताकति बा। धरती के कोरा अँचरा में डालि खोंइछ बइठा पँजरा में भरितू मांग पिन्हइतू मुनरी, नजरी डगरी ताकति बा। छमछम छागल आजु बजावत पुरुआ के संग नाचत गावत आवऽ, तनि जा हरिअर चदरी, नजरी डगरी ताकति बा। संगीत सुभाष, मुसहरी, गोपालगंज।

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हमहूं लूटीं तेहू लूट

हमहूं लूटीं तेहू लूट। दूनो पहिने मंहग सूट। उपर वाले के भी खियाव। अपने पीअ आ उनके पियाव। अईसे जो कईले जईब त रिश्ता हरदम रही अटूट। हमहूं लूटीं तेहू लूट। अंगरेजन के हवे सिखावल। आ हमनी के ई अपनावल। शासन अगर करे के बा त जनता मे डरले जा फूट। हमहूं लूटीं तेहू लूट। अगर करे केहू कंप्लेन। साहब के द तू सैम्पेन। उनसे मिल-जुल मौज उड़ाव साथे उनके ल दूई घूंट। हमहूं लूटीं तेहू लूट। आदिकाल से चली आईल बा। केहू न येसे बच पाईल बा। केहू के…

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साँवरी गधबेर

उखम थोरिक, हवा गुमसुम, साँवरी गधबेर। ओरमाइल घन बदरवा, गइल हऽ मुँहफेर। अबहिएँ कुछ देर। पलक पर पानी न छलकल, ना सिराइल ह अगन। देहि के तिसना अतिरपित, का कहीं कतिना तपन? चारि फूही के उमेदे, नयन तरई हेर। साध रहि गइलसि अपूरन, सघन भइल अन्हेर। नीनि रहलसि घेर। साँस में चम्पा कटेरी, गंध के गहिरी चुभन। मन-मिरिग तिरते रहल हऽ आँखि में अनगिन सपन। ओठ तरुआ हलक सूखल, जीभ अधरनि फेर। अकसगंगा धार पातर, निरभ राति उबेर- खेल रहलि अहेर। डाढ़ि में अँखुवा न फूटल, पात पर ना फुरफुरी।…

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अउर तिवारी का हाल हौ ?

बहुत दिना के बाद देखअइलअ , एकदम से दूबराय गयअ , अब का करअ धरअ अइलअ तू  धरम-करम जब खाय गयअ जब बीमार रहलीन माई तब कउनो खबर न लेवै अइलअ गुजर गएन जब माई-बाउ , तब के के का देवै अइलअ गाँव देखकर के का करबअ उहै ऊँच हौ ,उहै खाल हौ || होतअ बँटवारा भग गइलअ सब कुछ बेच-बाच के आपन तीउराइन क सपना टूटल टूटल माई-बाउ क मन बेटवा जब पलने में रहल , तब आवारागर्दी सुझलेस , बाबू कइसे घर चलईलेन केहु नाही गरीबी बुझलेस कइसे…

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गीत

कर जोरि बिनवे दुलारी बेटी, बाबू जनि काटीं हरिअर गाछि पलंगिया का कारन जी। आम, महुआ, पाकर, गुलर, बर जी, बाबा निमिया, निबुइया, जमुनिया धरतिया के छाजन जी। मथवा क अँचरा सरकत खने जी, डलिहें सुरुजमल कुदीठि त माई सकुचाई जइहें जी। सजना अँगनवाँ दुरूह काज हो, धिया, दिनभर खटि-मरि थकबू त रयनि का नींनि लेबू हो? कहवाँ सुतइबू गोदिलवा नू हो, धिया, कहवाँ सुतइबू सजन केरि चरन दबइबू नू हो। कीनि दीं बाबू हँसुअवा नू जी, बाबू, घने-बने खरई कटाइबि, तरई बनाइबि जी। लीपि-पोति घरवा अँगनवाँ क जी, बाबू,…

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