बिछावे जाल मछेरा रे

बिछावे जाल मछेरा रे सभके छीने बसेरा रे कहे हम भाग्य विधाता ह ईं सभ के जीवन दाता ह ईं सरग में सभका के पहुँचाइब हमहीं भारत माता ह ईं बढ़ावे रोज अंधेरा रे चकमक चकमक सगरो करे जोति नयन के चुपके हरे देखावे सपना रोज नया ई पेट सँघतियन के ई भरे भगावे दूर सबेरा रे कैद में सुरुज अउरी चान करे के बा ओकर अभियान बजावे ढोल ढमाका खूब नाप देलस धरती असमान उगावे खूब लमेरा रे करीं का कांटक सोचे रोज करेलन हथियारन के खोज बाँची मीन…

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एहि मटिये के नगद-उधार सखिया

बाटे माटी मुर्दार-जियतार सखिया एहि मटिये के नगद-उधार सखिया। मटिये में जमलीं आ मटिये में मिललीं मटिये के माल-असबाब हम रहलीं फेंके मटिये के चार गो कँहार सखिया । सँचि-सँचि सीत-घाम बरखा देखाइ के के राखे हमके गलाइ के सुखाइ के जइसे डाले कोहड़उरी- अचार सखिया । कहे भर अनुमति गाइ-गूइ चल दीं गीत गीतमलवा में एकठे पिरोइ दीं अउर कुछ नाही बस-अख्तियार सखिया । कइसे कहीं कहहूँ न देत बाटे जिनगी मउअतो से ढेर ई कड़ेर काटे जिनगी नाहीं जिनगी के कवनो एतबार सखिया । आनन्द संधिदूत

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