चलीं बात करे के

का जमाना आ गयो भाया,बात करे के परिपाटी फेर से उपरिया रहल बा। बुझाता मौसम आ गइल बा,मोल-भाव करे के बा, त बतकही करहीं के परी। बिना बतकही के बात बनियो ना सकत। ई चिजुइए अइसन ह कि एकरे बने-बिगरे के खेला चलत रहेला। बात बन गइल होखे भा बात बिगर गइल होखे, दुनहूँ हाल मे बात के बात मे बात आइये जाले। हम कहनी ह कि एह घरी मौसमों आ गइल बा,बाकि इहाँ त बेमौसमों के लोग-बाग मन के बात करे मे ना पिछुआलें। जब बात उपरा गइल बा…

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चुनउवा

सोझवें ओकतिया बतावेला चुनउवा नीमन-बाउर खेल खेलवावेला चुनउवा॥ कटिया करवावे,खेते खेत घुमावेला लहनी सरिआई के बोझ बनवावेला गउवाँ में चकरी पिसवावेला चुनउवा॥   तारु आ तरवा, दूनों पिराये लागल मन के उछाह, घामे थिराये लागल सबही से छिपनी धोवावेला चुनउवा॥   मुंहवाँ सुखाइल बाटे, ओठवा झुराइल कई घरी बीतल, पनियों ना भेंटाइल दिनही में चनरमा देखावेला चुनउवा॥   हाथ ज़ोरवावेला गोड़ धरवावेला टुटही मड़इया आ दुवरा देखावेला तिनगी वाला नाच नचवावेला चुनउवा॥   जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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