अपनापा

फगुनहट के सुगंध गाँव में उतर चुकल रहे। महुआ टपकत रहे आ हवा में भींजल मिठास घुलल रहे। रामदास के घर के आँगन में चूल्हा दहकत रहे। कड़ाही में पुआ फूल-फूल के उठत रहे जवना के रामदास के कनिया आँचल सम्हारत उलट-पुलट करत रहली। रामदास के पत्नी सीता खूब गोर,हँसमुख आ मेहनती रहली जेकरा कारण सबके मन में उनकर खास जगह बन गइल रहे।

रामदास, सादा मन के किसान रहले पर होली उनकर खास परब रहे।

पुआ छानत कनिया के दुआर के ओहँगन पर खड़ा होके मुस्कुरा के देखत रहलन आ नजर पड़ते धीरे से कहले -“एतना पुआ बनइबू त गाँव भर जुट जाई,”।

सीता आँख तरेर के बोली, “होली में कंजूसी शोभा देला? पहिले पेट रंगाई, फेर रंग भा माटी।”

एही बीच रामदास के छोट बहिन गीता, चंचल स्वभाव वाली, अपना जीजा सुरेश के साथ पहुँचले। सुरेश मजाकिया मिजाज के आदमी रहे। दुआर पर पहुँचते ही ऊ गीता के छेड़ दिहलन—

“देखऽ साली, तोहार भउजी त आज हमरे खातिर पुआ बना रहल बाड़ी।”

गीता खिलखिला उठी—“रउरा खातिर? पहिले कारण बताईं, तब पुआ पर हक जताईं।” ऊ कहलन- काहे से कि जइसे हमरा पुआ पसंद बा ओइसहीं पुआवाली भी खूबे पसंद बाड़ी।

एह हँसी में सीता लजा गइली, आ रामदास अपना पत्नी के ओर देख के गदगद हो उठले।

सांझि बेरा गाँव में ढोलक पर फगुआ गूँज रहल रहे—

“फगुआ में गइनी जे लजाईं सजनवा,

रंग फीका पड़ी जाई”।

रामदास घर के जिम्मेवारी के चलते ना पढलन। तीनों भाई बहिन पढ़ें में खूब तेज रहलन। रामदास अपना छोट बहिन गीता आ सीमा के शहर में नाम लिखवा दिहले रहले। दुनो बहिन के वजीफा मिलत रहे एह से पढावे में ढेर दिक्कत ना भइल। एही बरीस सीमा के पढ़ाई पूरा भइल त सुरेश से बिआह भइल। काहे कि ऊ सुरेश के पसंद रहली।सुरेश सीमा के साथही रख के नौकरी खातिर तैयारी करावत रहलन।

पहिल संवत के खातिर ई दूनो जन के बोलावल गइल रहे।

सीमा आ गीता गाँव जब आवे लोग त पर्यावरण के प्रति गाँव में लोग से जागरुकता ले आवे खातिर बात करस। एह बार रंग के मिलावट के कारण होवे वाला बिमारी पर चर्चा भइल। गाँव के बड़का बाबा कहलन- ई रंग आ रंगबिरंगा अबीर त अब आइल ह। हमनी त पहिले माटिये से रंग खेलत रहीं। त उहे होई।

ए साल गाँव के बुजुर्गन के सलाह पर रंग कम आ माटी से होली खेले के तय भइल रहे। पोखरा किनारे भींजल माटी के ढेर बना के रखल गइल रहे त नदी के किनारे गड़ही बना के। खूब जमल अबकिर होली।

सब एक-दूसरा के गाल पर माटी मलत, हँसत, गावत रहे।

ओही भीड़ में रामदास के छोट भाई के मेहरारू सरिता खड़ी रहली। साँवरी रंग आ गंभीर स्वभाव वाली सरिता के आँख में अधूरापन झलकत रहे। उनकर पति कमाई खातिर शहर में रहलन आ ए बार होली में ना आ पवलन। जीजा-साली के ठिठोली देख के ऊ मुस्कुरा त देत रहली, बाकिर भीतर कहीं कसक उठत रहे।

घर लौटला पर उनकर दूनो नन्हकी बिटिया माटी सने हाथ से छू देली।

सरिता झल्ला उठली—“दिन भर उधम! कुछ सुघराई सीखऽ लोग!”

बिटिया सहम के चुप्प हो गइली।

इ दृश्य देख के घर के सबसे बुजुर्ग बड़की दादी, झुर्रीदार चेहरा आ तेज नजर वाली, लाठी टेकत आगे बढ़ली।

“छोटकी,” दादी कड़की आवाज में बोलीं, “मन के दुख बच्चन पर मत उतारऽ। होली के दिन घर में रोआ-धोआ ठीक ना होला।”

सरिता के आँख भर आइल। “दादी, ए घड़ी ऊ आ जातें त…”

दादी नरम पड़ गइली। “बेटी, आदमी तऽ दूर अकेले बा, बाकिर तोहार घर, तोहार बच्चा, ई माटी—सब त तोहरे साथ बा।”

साँझ होते-होते आँगन में पुआ-पूरी के थार सज गइल। दही-बड़ा के खुशबू फैल गइल। ढोलक पर फिर गीत उठल। रामदास धीरे से सीता के पास आके कहले— मटिया फेंकनी हऽ आ ऊ तहरे पर लागल ह ,बुझलू ह काहे। हम तहरा के देख के….. कहते आउर लगे आके धीरे से कहले –

“तोहरा संगे हर होली नयके लागेला।”

सीता मुस्कुरा के बोली—“त माटी के ई रंग कबो सूखे मत देहब।”

सरिता दूर से ई स्नेह देखत रहली। बिटिया लोग हँसत-दौड़त उनका आँचल से लिपट गइली। सरिता एह बेर डँटली ना, बस चुपचाप गले लगा लिहली।

बड़की दादी आसमान निहारत बुदबुदइली—

“रंग उड़े ला, गुलाल सूख जाला… बाकिर अपना माटी में मिलल अपनापा सदा जिंदा रहेला।”

ओह दिन गाँव में रंग सचमुच कम उडल, माटी जादे लागल। पुआ के मिठास, गीत के गूँज आ मन के मेल—एही में होली के असली रंग चमकल।

 

 

  • डॉ रजनी रंजन

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