हम कवि ना बानी

मरि गइल बा

आँखि के पानी

तबो गावत बानी

पंजरे सटिके राजाजानी।

 

हमरा खाति मंच बा

ओसे बढ़िके पंच बा

गोल बा गोलबंदी बा

बाँचि रहल लोग बा

हमरे कहानी।

 

सरकारियों अलम बा

दोसरे के कलम बा

सगरों हमरे पूछ बा

नीमनका छूंछ बा

जारत लोग सरमे

आपन ज़िंदगानी।

 

हम सरब गुन आगर

छांछत जवानी के सागर

एही से ऊ हमरा के मानेलें

खटियो पर अपने जानेलें

सभेके पियाइले पानी।

 

हर बेरी हमरे बोलावेले

निगचे जाँति बइठावेलें

चिक्कन बनिके घूमिले

पूछीं मति का का चूमिले

कविता गीत के इहे निशानी।

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

http://www.bhojpurisahityasarita.com/wp-content/uploads/2020/01/फुलसूंघी.pdf

Related posts

Leave a Comment