साधो, अब न रहब यहि गाँव

हियाँ उमर भरि रोध हजारन,
पग-पग कूकरहाँव।
गोबर गउआँ बात न बूझसि
चमगीदर मग धावसि,
उरझि-पुरझि मरि जासि बावरा
अंतभेद नहिं पावसि।
निपट फरेबी सियरन के सुर
छेद रहल गहिराँव।
सिधवा के तिल-तिल मउअति बा,
टेढ़िया फरे फुलाय,
थोपल जाय तबेला माथे,
बानर केरि बलाय,
न्याव टकौरी दोल्हा खेले,
उल्टे-सीधे दाँव।
जटहा बरगद पात चोरावल,
तरकुल मन अगराइल,
बन-बबूर करइल गाछी के,
रूखर तन गदराइल।
अमराई में कउआ कुल के
मचल गदर गुहराँव।
कोइलि का गइहें मनसाइन?
करुई बोलि बढन्ती,
कहवाँ फूल कटेरी चम्पा,
फफसत जाय बिजन्ती।
धुन-सुबास-दृग-तिसना मूअल,
मरघट के पसराँव।
बुढ़िया तंत्र साधना साधे,
पूत-धिया बन माँके,
कुटना मंत्र उचाटन बाँचे,
चुरइलि पीपर हाँके।
जरलजुबाँ ललजीहा काढ़े,
भइल बिधाता बाँव।

साधो, का रहना अस गाँव?

  • दिनेश पाण्डेय

Related posts

Leave a Comment