साँवरी गधबेर

उखम थोरिक, हवा गुमसुम,
साँवरी गधबेर।
ओरमाइल घन बदरवा,
गइल हऽ मुँहफेर।
अबहिएँ कुछ देर।

पलक पर पानी न छलकल,
ना सिराइल ह अगन।
देहि के तिसना अतिरपित,
का कहीं कतिना तपन?
चारि फूही के उमेदे,
नयन तरई हेर।
साध रहि गइलसि अपूरन,
सघन भइल अन्हेर।
नीनि रहलसि घेर।
साँस में चम्पा कटेरी,
गंध के गहिरी चुभन।
मन-मिरिग तिरते रहल हऽ
आँखि में अनगिन सपन।
ओठ तरुआ हलक सूखल,
जीभ अधरनि फेर।
अकसगंगा धार पातर,
निरभ राति उबेर-
खेल रहलि अहेर।
डाढ़ि में अँखुवा न फूटल,
पात पर ना फुरफुरी।
कउँध बिजुरी के अनेरे,
महज आँखिन तिरमिरी।
आजु ले तिनुका न जामल,
हो रहल बा देर।
बितल अदरा आव बदरा,
बरिस नेह फुहेर।
पिछिल बैर निबेर।
#आव_बदरा#

  • दिनेश पाण्डेय
    पटना।

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