साँच आ झूठ

साँच लुकाइल मूँजवानी में, झूठ लगवलस आसन।
बोलतू का मुँह जाबी लागल, गूङ्गा झारे भासन।
नियम – नेतिके दण्ड तुरिके ध दिहलसि परसासन,
गोहुँअन साँप बनल फुफुकारे दिनहीं रोज दुसासन।
भँइस उहे ले जाता, जेकरा हाथे बाटे लाठी,
फूल बिकाइल जहवाँ, उहवाँ आजु बिकाता काठी।
खोरि- खोरि लहसावे आगी, लिहले लोग लुकाठी,
बाघ डेराके भागल ओके चोटिया दिहलसि पाठी।
पंचइती में बानर बइठल, कुक्कूर के रखवारी,
भीख कुबेर के मांगत देखनीं, दानी भइल भिखारी।
बाड़ जजाति चरत बा रोजे, मचल ह मारामारी,
पहलवान पटकइलें पहिले, डगदर घरे बेमारी।
चनन लगाके बने संत मंगरु, झबरु व फुलेसर,
कुछदिन में भगवान हो गइलें, देखि लजालें ईसर।
सुतनीं टाङ्ग पसारिके हमहूँ, खेत परल बा ऊसर,
अन्न जोजना बाटे, खाइबि, बनि जाइबि धमधूसर।
चन्दाके जोन्ही निहसावे, कइसन तहरे जोती?
सगरे जगत अँजोर भइल बा हमसे, हमरी होती।
नदिया सुखली, उपरवछा बा नवका सोता- सोती,
पँएट किनाइल रकटू पेन्हलें, फेकलें गमछा- धोती।
  • संगीत सुभाष
मुसहरी, गोपालगंज।

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