सरस्वती बंदना

जय हो मइया शारदा, होसवा बिसारी द।

हम निरगुनिया अधम अभिमानी

तोहरी किरितिया के कइसे बखानी

मोह अगियान सब जरी से उजारी द। जय —

 

अरगवों के गोदी मे उठवलू

नाही जानी हमरा के काहे बिसरवलु

कि हमरो के खोली के पलकिया निहारी द। जय —

 

केहु ना सहायी माई तोहके पुकारी

राति दिन तोहरे डगरिया निहारी

कि हमरो दुआर कबों हंस के उतारि द। जय —

 

चारु ओर छवले गहन अंधिअरिया

जाईं कहा सूझे नाही कवनों डगरिया

कि हिया बीचे दिया तनि ज्ञान के तू बारि द। जय —

 

मन के  कियरिया में रस बरिसाव

सूखल कमलवा के फेरु से खिलावा

कि बीनवा के तार एह बार झनकारी द। जय —

 

आस बा सुभास के तू आई के पुरावा

मन का कमल पर आसन लगावा

कि नाही चाही अन-धन देहिया दुलार द। जय —

 

  • सुभास यादव

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