प्रो. बलभद्र के आलोचना-दृष्टि

भोजपुरी साहित्य में आलोचना विधा विकासशील बा।भोजपुरी आलोचना में मैदान खाली बा।एह दिसाईं ढेर परती-पराँत बा।एह दिसाईं बहुते मेहनत के दरकार बा।एह स्थिति में सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली द्वारा सद्यः प्रकाशित डॉ बलभद्र के आलोचना पुस्तक”भोजपुरी साहित्य:हाल-फिलहाल”भोजपुरी आलोचना विकसित करे के दिसाईं उल्लेखनीय कृति बा।माईभाषा में शिक्षा के जरूरत अब राजपाट भी महसूस कर रहल बा।5अगस्त,2021के द हिंदू में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के माईभाषा में शिक्षा के महत्व के प्रसंग में एगो लेख:”ए लैंग्वेज लैडर फॉर एन एडुकेशन रोडब्लॉक” (शिक्षा मार्ग खातिर शिक्षा के सीढ़ी)प्रकाशित भइल बा।तकनीकी शिक्षा के अखिल भारतीय परिषद् के फैसला बा कि नयी शिक्षा नीति के तहत एगारह राज्यन में बी. टेक प्रोग्राम माईभाषा में होइ।माने माईभाषा के महत्व उपरी स्तर पर बुझा रहल बा।राजनीतिक आजादी त मिलल, भाषाई औपनिवेशिक मानसिक गुलामी से आजादी बाकी बा।चीन में उच्च शिक्षा मंडारिन भाषा में संभव बा, भारत में ना।जापान में जापानी, रूस में रूसी, जर्मनी में जरमन, फ्रांस में फ्रेंच भाषा में उच्च शिक्षा देल जा रहल बा, अँग्रेजी के वोहिजा कामे भर काम बा, बाकी भारत में राजपाट पर अँग्रेजी लॉबी हाबी बा।अपना माईभाषा के उन्नयन के दायित्व भाषा विशेष के लेखक का प्रकाशक आ पाठक के बा।एह दृष्टि से प्रो. बलभद्र के सद्यः प्रकाशित पुस्तक:”भोजपुरी साहित्य:हाल-फिलहाल”के स्वागत होखे के चाहीं।

उल्लेख्य पुस्तक के विषय-वस्तु

कवनो साहित्य फलक बहुत विस्तृत होला जवना में कविता, कहानी, उपन्यास,लघु उपन्यास, नाटक, निबंध, जीवनी, आत्मकथा, डायरी, संस्मरण, यात्रा-संस्मरण, व्यंग्य, समीक्षा, आलोचना, रिपोर्ताज़ आदी सबकुछ समाहित बा।”भोजपुरी साहित्य:हाल-फिलहाल”में आलोचक डॉ बलभद्र अपना के भोजपुरी कहानी से कविता तक के विवेचना तक सीमित रखले बाड़न।अपवाद स्वरूप एगो लघु उपन्यास के चरचा बा आ एगो कथेतर गद्य पर लेख समाहित बा।इ एगो पुस्तक के सीमा भी हो सकेला।

विवेचित पुस्तक में मात्र25गो आलेख संकलित बा।भोजपुरी कहानी विधा पर मात्र छव गो आलेख बा।”भोजपुरी कहानी के फिलहाल”एगो उल्लेखनीय आलेख बा जवन पहिला आलेख बा।एह में अनेक भोजपुरी कहानियन के विश्लेषण बा।किताब में कवनो भूमिका नइखे।’भोजपुरी के महिला कहानीकारन के कहानी ‘दूसर लेख बा।बाकी’कथा गइल बन में’प्रेमशीला शुक्ल के कहानी-संग्रह’जाए के बेरिया’के भूमिका ह।’गाँव के भीतर गाँव’के बारे में”वरिष्ठ कथाकार अशोक द्विवेदी के कहानी-संग्रह के समीक्षा ह जवन’भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’के फरवरी-मार्च,2000अंक में प्रकाशित रहे।दू दसक से बेसी हो गइल एह कहानियन के रचना भइला।’कहानी में सवाल-जबाब के तर्ज में’कथाकार सुरेश काँटक के कहानी-संग्रह’समुंदर सुखात बा’के समीक्षा ह जवन’समकालीन भोजपुरी साहित्य के अंक-17में, सन्2002में छपल बा।एगो आलेख’बटोहिया’के कहानी अंक के समीक्षा ह जवन’पाती’के जनवरी-मार्च,1997में प्रकाशित बा।माने24बरिस पहिले के कहानियन के समीक्षा।आलेख’बेओरचले ना खटिया काम जोग ना कहानी’,19-20सितंबर,2015के भोपाल(मध्यप्रदेश)में भोजपुरी साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश द्वारा आयोजित कार्यक्रम’भोजपुरी कहानी:पाठ एवं विमर्श’पर रपट ह जवना में डॉ बलभद्र शामिल रहन।अइसे त भोजपुरी कहानी के इतिहासे1948से शुरू होता, त एह में जे बा तवन सब हाले फिलहाल के बा।

रामनाथ पाण्डेय के’बिंदिया’1956में छपल रहे।इ भोजपुरी के पहिला उपन्यास ह।भोजपुरी कथा साहित्य के उद्भव विकास’नामके लेख में वरिष्ठ साहित्यकार कन्हैया सिंह’सदय’सन्2010तक53गो भोजपुरी उपन्यासन के सूची पेश कइले बानीं जवना में भगवती प्रसाद द्विवेदी के लघु उपन्यास ‘साँच के आँच’भी शामिल बा।विवेच्य पुस्तक में इहे एगो उपन्यास के समीक्षा शामिल बा:’कवन दिशा में’।भोजपुरी साहित्य के हाल फिलहाल के संदर्भ में विशेष तौर पर उपन्यास विधा में इहे एगो उपन्यास के चरचा के औचित्य नइखे बुझात।इ आलोचक के व्यक्तिगत मजबूरी हो सकेला आ सिस्टम के व्यवस्थागत दोष भी।

भोजपुरी कविता के संदर्भ में एगारह गो छोट-बड़ लेख-समीक्षा किताब में संकलित बा: कविता के भीतर के बतकही, भोजपुरी कविता:साँच कहे के बान, भोजपुरी जनगीत, मोती बी ए के काव्य-दृष्टि, किसान कवि बावला, पी चंद्रविनोद के गीत:तनी गुनगुनात, गीत में परिवेश के आलोचना:जतने मुखर ओतने मौन(आनंद संधिदूत),बृथा नइखे व्यथित के व्यथा(बैजनाथ दुबे’व्यथित’),शारदानंद जी के’बाकिर’,कन्हैया पाण्डेय की कविताई,’कविता ‘के गजल अंक के समीक्षा।एह छोटहन सूची में सात गो लेख सात गो प्रिय कवियन के कविता-संग्रहन के समीक्षा बा एह सात कविता-संग्रहन के समीक्षा से भोजपुरी कविता के हाल फिलहाल के तसवीर उभरल मुश्किल बा।भोजपुरी भाषा के प्रति राजपाट के रवैया अनुकूल नइखे, तबो एह विपरीत परिस्थितियन में भोजपुरी आलोचना संसार के फलक के विस्तार देवे के डॉ बलभद्र के संकल्प सराहनीय बा।ऊहाँ के हिंदी आ भोजपुरी दूनों मोरचा पर सक्रिय बानीं जइसे डॉ विवेकी राय जी(जनम:19नवंबर,1924,निधन:22नवंबर,2016)हिंदी भोजपुरी दूनों में समभ्यस्त रहीं।आजो कुछ वइसन नाम बा।

डॉ बलभद्र के आलोचना-दृष्टि

आलोचक डॉ बलभद्र के संवेदना मेहनतकश भूमिहीन किसान आ मजूर वर्ग के साथे विशेष बा।उनुकर जुड़ाव आ लगाव भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन से रहल बा।भारतीय संविधान में समाजवादी समतावादी लोकतान्त्रिक गणराज्य के स्थापना के सपना के अंगीकार कइला के बादो ना जमींदारी मेटल ना सामंती प्रवृत्ति मेटल।पुरनका सामंत बड़ले बा तबले नवका सामंत परिदृश्य में आ गइल।बलभद्र के दृष्टि में रचनात्मक साहित्य के ऐतिहासिक कार्यभार बा जे ऊ एह सामाजिक-राजनीतिकयथार्थ के संदर्भ में साहित्य के हर विधा में रचना करे।एह तरह के रचनाशीलता डॉ बलभद्र के भोजपुरी कथाकार सुरेश काँटक, अशोक द्विवेदी, तैयब हुसैन’पीड़ित’,भगवती प्रसाद द्विवेदी, कृष्णानंद कृष्ण, रामदेव शुक्ल, रमाशंकर श्रीवास्तव(दिवंगत),डॉ कमलाकर त्रिपाठी, रामलखन विद्यार्थी,),प्रकाश उदय, जितेन्द्र कुमार, सुमन कुमार सिंह, अनीश श्रीवास्तव, आदित्य नारायण आदी के कहानियन में मिलत बा।आलोचक के मोताबिक उपरोक्त कहानीकारन के कहानियन में किसान-संघर्ष के चेतना बा।बलभद्र भारतीय समाज में स्त्री उत्पीड़न से मर्माहत बाड़न।कथाकार अशोक द्विवेदी के कहानियन में स्त्री उत्पीड़न के परदाफाश बा।उनुकर’पोसुआ’कहानी में सामंती उत्पीड़न के दास्तान बा।सुमन कुमार सिंह के’घनचक्कर’कहानी में एगो स्त्री-पक्ष बा।विष्णुदेव तिवारी के’गुरिया साहु के गाँव’में स्त्री पक्ष बा।कवि-कथाकार प्रकाश उदय के लमहर कहानी’कथा सतनैरना के आठवाँ अध्याय’में विधवा पंडिताइन के अद्भुत आधुनिक चरित्र बा।सवर्ण समाज के विधवा पंडिताइन मुक्त नारी चेतना के प्रतीक बाड़ी।उ सामंती परिवेश के चउकठ लाँघ के तथाकथित अछूत श्रेणी के स्त्रियन संगे उठ बइठ करत बाड़ी।

डॉ बलभद्र के आलोचना के एगो खूबी बा कि ऊ भोजपुरी आलोचना के झाल बजावेवाली आलोचना के अतिक्रमण करत बाड़न।रचना में कतहीं कथ्यगत झोल झाल बा त उ बेहिचक रेखांकित करत बाड़न, कथाकार उनकर सुपरिचिते काहे ना होखसु।विष्णुदेव तिवारी के’गुरिया साहु के गाँव’कहानी से बेसी बढ़िया उनुकर कहानी’ओरचन के खटिया’लागतबिया काहे कि ऊ’व्यवहारिक’बिया।हालांकि ऊ बतावत नइखन कि कहानी में व्यवहारिकता का होला?’गुरिया साहु के गाँव के शिल्प उनका कोलाज जइसन लागता।कथा शिल्प में ऊ नया प्रयोग के पक्षधर नइखन।जनवादी चेतना के आलोचक प्रयोग से काहे घबरात बा?इ बात बा कि कहानी भा कविता के विश्लेषण बेबाक ढ़ंग से करत बाड़न, कवनो लल्लो-चप्पो ना।दिवंगत कृष्णानंद कृष्ण के चर्चित कहानी’कालो दी’के बारे में बलभद्र के टिप्पणी बा:’कालो दी के हत्या के बाद, मठ के ढहते ई पुरा संघर्ष पता ना कहवाँ दो उधिया-विला जात बा।जबकि बिहार में, भोजपुर में अब एह तरह के आंदोलन के आपन एगो जनाधार बा, निरंतरता बा।एह कहानी के मूल में संघर्ष कम समझौता जादे बा।’उनका कथाकार बरमेश्वर सिंह के कवनो कहानी पसंद नइखे।प्रो ब्रजकिशोर के कहानी’एगो आउर अभिमन्यु’नक्सलवादी गंभीरा साव के पुलिस हिरासत में मौत पर आधारित बा।बाकी इ कहानी के उल्लेख बलभद्र नइखन करत।

बलभद्र लिखत बाड़न:’भोजपुरी में साँच कहल जाए त, कहानी के कमी बा उहो में बढ़िया कहानी के त आउर(पृष्ठ25 )।’उ आगे लिखत बाड़न:’रचनाकार खातिर ई जरूरी होला कि ऊ बद्धदायरा के बाहर आवे’।’बद्धदायरा’के ऊ व्याख्यायित नइखन करत।एगो अस्पष्टता रहि जाता।लव शर्मा प्रशांत के कहानी’दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे’पर बेधक टिप्पणी बा।ओकरा बरक्स नरेन्द्र शास्त्री के कहानी’कुजतिहा’सार्थक बिया।अंकुश्री के कहानी’कनफूल’सफल कहानी बिया।रामदेव शुक्ल के कहानी’तिसरकी आँख के अन्हार’,’जरसी गाय के बछरू’,’सुग्गी’पर सकारात्मक टिप्पणी बा।

विवेच्य पुस्तक में’भोजपुरी महिला कथाकारन के कहानी’पर एगो अलग से आलेख बा।एह में रूपश्री, प्रेमशीला शुक्ल, चंद्रकला त्रिपाठी, चंद्रमुखी वर्मा, उषा वर्मा, डॉ मधु वर्मा, मधु वर्मा, आशा श्रीवास्तव, आशारानी लाल, नीहारिका, सीमा स्वधा, इलारानी गुप्ता, शांति देवी, किरण श्रीवास्तव, उषारानी मिश्र, सुमन सिंह के कहानियन के सार्थक विश्लेषण बा।।

कविता खण्ड में”कविता के भीतर के बतकही”आ”भोजपुरी कविता:साँच कहे के बान”आ”भोजपुरी जनगीत”उल्लेखनीय बा।एह सब में भोजपुरी के आदि कवि कबीर, आधुनिक कवि भिखारी ठाकुर, रमाकांत द्विवेदी रमता, रघुवीर नारायण, दुर्गेन्द्रअकारी, तैयब हुसैन’पीड़ित’,विजेन्द्र अनिल, गोरख पाण्डेय, प्रकाश उदय, हरीन्द्र हिमकर, चंद्रदेव यादव, सुरेश काँटक, आनंद संधिदूत के विस्तृत चरचा बा।

आलोचक बलभद्र के प्रतिपादन बा कि’भोजपुरी कविता के पहचान एक लेखा गाँव के कविता के रूप में बा।…..भोजपुरी कविता सही माने में रिश्ता-नाता के कविता ह, ओकर स्पष्ट उचार(पृष्ठ62)आसिफ रोहताश्वी, सुरेन्द्र कुमार सारंग, कमलेश राय, उदय प्रताप हयात, अक्षय कुमार पाण्डेय, मिथिलेश गहमरी, जितेन्द्र कुमार, आदी कवियन के उल्लेख बा।कवि के कवितन के प्रवृत्तियन के विश्लेषण नइखे।

भोजपुरी जनगीत के प्रसंग में डॉ बलभद्र के कथन बा कि”जनगीत वाम जनवादी राजनीति के सांस्कृतिक अभियान के जरूरी हिस्सा ह।….पहिले से जवन गीत, लोकगीत रहे, तवना के नया दिशा, चेतना आ एगो अभियान मिल गइल।’

‘भोजपुरी साहित्य:हाल-फिलहाल”के प्रस्तुति दू खंड में रहीत–(1)कहानी खण्ड,(2)कविता खण्ड-त आऊ शानदार होइत।दूनों तरह के लेखन के घालमेल अखरत बा।तबो घीव के लड्डू टेंढ़ो भला।

एह पुस्तक के प्रकाशक सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली आ ओकर समन्वयक युवा लेखक केशव मोहन पाण्डेय जी के अवदान भुलाइल ना जा सके।उम्मीद बा डॉ बलभद्र के एह किताब के भोजपुरी संसार स्वागत करी।

  • जितेन्द्र कुमार,

मदनजी का हाता, आरा-802301

मो9931171611

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