वसंत के रंग

वसंत, मन के रंग के होखेला
बाकिर मन के कवनो रंग ना होखेला!
उ बेरंग भी ना होखेला, धूसर भी ना
उ हरमेसा इंतजार के रंग में देखत रहेला रास्ता
जवना कवनो रंग में आवs उ तहरा के
आवे देव
माटी नियन
जे जाने केने आए लियावेले
पौधन में हरीहरी,
बोगनवेलिया आ दसबजिया के अलग अलग रंग.
हम तहरा के देखीं जेठ में त बसन्त जइसन लागेली तू
एह बात पर टोकल नइखे जा सकत की
ई जाइज नइखे, एह मौसम, ऐतिया कइसे
बाकिर रंगन के लेके एतना निफिकिर बतियावल ठीक नइखे —
तहरा आए भी!
उ लोग हर देवाल कान लगवले बइठल बा
ओकनी के अंदाजा बा
उ खाली हमरा आ तहरा बीच के मुस्किल से बाचल
एह जगह के बारे में ही नइखन सोचत
ओकनी के ओह फूलन से दिकत बा
जवान प्यार के देखके प्यार के रंग में हँसे लागेले सन
उ ओकनी के एकदमे बरदास नइखन स कर सकत
जे समय के ख्याल ना राखेला
जे एतना जिदी बा की
अपना छन के अमरता के बिस्तार में
बरिसन-बरिस पड़ल रहेलन साथे-साथ
फिलिम देखत, गुनगुनात
आ किताबन के बसियाइल पन्नन के पलट पलट के रंगीन करत
देखीं उ लापरवाह लोगन के
अपना-अपना रंगन के लेके मचल तनातनी के बीच
उ लोग सुतल बा
इंद्रधनुष लपेटsले
बसंत के सपना में बड़बड़ात
प्रेमिका लोगिन के नाम.
ओह लोग के ओह तटस्थता के हिदायत सायद यादो ना होखे
संभव बा
रउरा ओह लोग के जगाईं हिलायीं
त नीन से उठे आ कहे
इ का रंग चढ़ल बा तहरा पर.
अउर ओकनी के समझा पावल कतइ सम्भव ना होखे की
हमरा ओकनी पर चढ़ल रंग उतारे खातिर भेजल गइल बा
खाली बसंत के दिनन में हम कुछ बोल ना पाइब
ओही मीठ चासनी नियन
हर जगहा से सटके पकड़ ली
हम पसेना-पसेना हो जाइब, बाकिर बंसत के फूलन के खुसबू से भरल.
सोचेम पंखा चला लीं लेकिन भय खाएम
उतरत सरदी में अंझुरा जाए से
बसंत के बोखार चइत ले
हमरा फेंफड़ा के जकड़ले राखी.
बेहतर बा जेतिया उतर रहल बा
बसंत मन में अउर मन बसंत में
चाहे तू ओकरा के सरसो के फूल जइसन पीयर रंग के मानत होखs
भा चना के झिंगरी नियन हरिहर
चाहे तू झरत आकास के नमी के
अपना नसे-नस में महसूस कर पा रहल होखबs भा ना
एह कुम्हलाइल घाम में —
हर रंग का ओर फेर से देखs
तपे द बसंत के प्रेम के तन में
धधक के जरे दs ओकरा के मन में लाल पीयर
तू सोचs ओह लोगन के बारे में
जेकर चेहरा से उतर गइल बा रंग
रचs एगो मीठ खडयंत्र
की बसंत के जाए जाए ले
कवन कवन रंग मल डलबs उनकरा गाल पर
गुलाल त उड़ी लालो ,गुलाबियो
आसमान के मांग सून ना रही
बसंत एह बात के बेलकुल बाउर ना मानी
की के के भींग गइल, के के गील भइल
केकरा कुफुत भइल, केकर सफ़ेद कपड़ा कवनो काम।के ना रहल.
(मूल कविता – सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज)
भोजपुरी भावानुवाद – डॉ मुन्ना कुमार पाण्डेय

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