चठइल

ओझइती कइके लउटत घड़ी संतजी का खरहुल में चठइल पसरल लउकल। सोंचलन की भीतरा ढुक के देख लिहल जाव जदि दू चार गो भेंट जाई त भात पर का चोखा के जोगार हो जाई। जब ऊ चठइल का लती के उलिट पलिट के देखलन त अचरज में पड़ गइलन। काहे कि हर लतिये में सात गो आठ गो चठइल फरल रहे। ऊ चटकवाही देखावत लगलें तुड़े आ जमीने पर धरे।उनुका मन में एगो डरो रहे कि कहीं एही बीच खरहुल के मउआर आ गइल त चठइल अधिआ लीही।भल भइल केहू आइल ना आ ऊ सगरी चठइल तुड़ के गमछी दोबर के ओही में बान्ह लिहले।आ घरे ला चल दिहले।
चठइल के मोटरी बथानी में रख गोर हाथ धो के जइसही बँसखटिया पर बइठले उनुकर नव बरिस के पोती धउरत आइल आ कहलस “ए बाबा भोरहीं से कहाँ गइल रहल ह? कुमरा भइया बहुते खिसिआइल बा। आज तूँ जलपानो नइख कइले,माइयो खिसिआइल बिया।”
“जो जो काम पड़ी त आदमी कहीं जाई ना।कह दिहे हम ओनही जलपान कइ लिहले बानी। आ हँ सुन हई मोटरी घरे लिहले जो आ माई से कह दिहे एकर चोखा तनी अंग लगा के बनइहें।”अतना कह के संत जी चठइल के मोटरी अपना पोती का माथ पर रख के घरे भेज दिहलें। उनकर घर बथान से डेढ़ स डेग ले दूर रहे।
एकरा बाद संत जी अपना पोता कुमार का खिसिअइला का बिषे में सोचे लगलन। ऊ ओकरा खिंस के खूब निमन से जानत रहस।पोता त उनुकर उमिर में बारहे बरिस के रहे लेकिन बाबा के पानी पिया देवे। काहे कि संतो जी अपना आदत से बाज ना आवस। लाख मना कइलो का बाद रोज दू चार गो कार्निस जूटाइए लेस आ लाग जास ओझाई में। केहू के बरहम बाबा के नाव ले के भभूत देस त केहू के लवंग पढ़ के। उनकर ई सब काम घर का लोग का तनिको ना भावे। काहे कि तब के लोग ओझाई त करवावे ठीक लेकिन ओझा का घरे आपन लइका लइकी बिआह कइल ना चाहे। कई बेर उनकर पतोह रो रो के सुसुक सुसुक के निहोरो कइले रहली कि रउआ ई सब काम छोड़ दीहीं ना त हमनी का घर के काँच कुँवार मारा जाई।लेकिन उनुका त ओझाई के निसा धरा गइल रहे।
ओही ओझाई का दम पर उनुकर ऊँख के छिलनी टाल के छिलनी सोहनी आ रोपनी सब केहू से अगताहे हो जाय। तब का जुग में बहुत लोग के भूत धरत रहे,त ऊ जाव त जाव कहाँ ? पइसा कउड़ी के अभाव आ डागडर के कमी ओझा भीरी जाए ला मजबूर कर देवे।तब का ओझो लोग के नाटो जस संगठन रहे।जइसे बाहर देश पर हमला करे में नाटो संगे रहेला अउसहीं ओझो लोग जब दुसर दियार में जाय त अपना दल का संगे जाय।
एक बेर संत जी,धारी जी,कवलेसर आ साधु जी के एगो कार्निस का ओझाई के फेरि में बहुते दुर्गति भइल रहे। एगो मरदाना कार्निस कवलेसर ओझा के खेलत खेलत अस धइलस कि जान बचावे ला गुरू लोग के पुकारे लगलन। आ गुरू लोग आपन जान बचावत पहिलहीं भाग चलल।ऊ गनीमत कहीं कि बीएमपी के जवान लगवे रहे उनुकर जान बचवलस।
चठइल भेजला का दू घंटा बाद जब संत जी दुआर पर भोजन ला पहुँचलन तवना घड़ी उनुकर पोता कुमार दुआर पर ना रहस ना त एक टक्कर होइए जाइत। संत जी खाए में अतना शौखिन रहस कि सागो में घीउ डाल के खास। जदि दाल तनिको पनिगर मिले त थरिये पलटि देस। दही खास त सजाव ना त ना।दूध भर कटोरा खास त चवनप्राश आ काजू किशमिश बरमहल। धोती बिना लिल के कबो ना पहिरस । उनुका आगा जब थरिया धराइल त चटनी ना लउकल। बस उनुकर ब्रह्माण्ड गरम “रे चँठइल के चटनी ना बनल हऽ!
केवाड़ी का अलोता से पतोहा कहली” चठइल घरे ना नू उपजे, भेजब तब नू बनी?
काहे बदमिया ना दिहलसिय?
ना कहाँ दिहलसिय?
रे बदमिया अइबे हेने? चठइल जब घरे ना लेअले ह त का कइले हऽ रे मुरूख?
बदमिया तनि दूरे से कहलस “तिरकोल जस जहर भेजले रहल ह हमनी के मुआवे खातिर। त हम मछरी का गरही में बिग दिहनी हऽ।”
रह बनचरी तोर हाथ गोर तुड़तानी, अतना मेहनत से ले आइल चठइल ते गरही में बिग दिहले ह!
बेचारी बदमिया बाबा से मार खाए का डरे सप्ताह दिन ले लूकात फिरल।
  • पैनाली दिलीप 

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