मूलमंत्र

आज सुबह सवेरे नई धोती व कुरता पहनकर बाबूजी ने बरामदे में रखी बाबासाहेब की मूर्ति को उतार कर पोछा और बगान से फूल तोड़कर माला बनाकर भीमसाब को पहना दिया। प्रणाम कर उनके समक्ष आँखें बंद करके चुपचाप खड़े रहे। पोते पोती दादा का यह कार्यक्रम देखकर आपस में इशारेबाजी कर रहे थे।
अचानक दो बच्चे आपस में यह कहकर लड़ने लगे कि मोबाइल पहले मैं चलाऊंगा। आपस में लड़ते लड़ते मोबाइल पटक दिया और उसकी इतिश्री ने घर को रणक्षेत्र बना दिया। दादा जी की भक्ति भी न जाने कहाँ चली गई ।वे दौड़ कर आए और बच्चों को समझा बुझा कर शान्त किया। बेटे बहु को भी डाँटा- एकदिन जरूरत पड़ने पर बच्चे अनुशासन नहीं सीखते।
बाबा साहेब को पहले आपसब पढो फिर बच्चों को भी पढाओ ।अगर भविष्य में शान्त जीवन चाहते हो। सुनो! घर का मालिक और मालकिन मिलकर अपने घर का विधान बनाते हैं ।वे भी वही अपने स्तर पर कर्तव्य अधिकार समता समानता और न्याय अन्याय आदि सीखाते हैं जो अलिखित किन्तु मनस अंकित होता है।
जिसप्रकार देश के लिए बाबा साहेब का संविधान मूल है जिसे भारत की जनता को स्वीकार करना ही पड़ता है क्योंकि यह ‘सर्वहिताय’ है ठीक वैसे ही घर के कायदे कानून घर का ज्येष्ठ कोई मालिक पूर्व के परम्परा में थोड़ा बहुत बदलाव के साथ जब बनाकर चलता है तो वह घर भी सहज व वैधानिक रूप में सुदृढ़ हो जाता है और जीवन आसान व आनंददायी हो जाता है।”
अबतक सभी बाबासाहेब व दादा जी दोनों को समझ चुके थे।

  • डॉ रजनी रंजन

Related posts

Leave a Comment