माफ करब माई !

गवें गवें जाम के लमहर रोगी बनत बनारस के एह घरी आउर बाउर हाल बा। चौमोहानियन के घेर के दुरगा माई के पंडाल बनावे के काम चल रहल बा। रोशनी के झालर लगावे खातिर ढेर लोग ऊंच ऊंच बांस , बल्ली आउर रसरी के सहारे लटकत देखात बाड़ें। ओह लोगन के देखि के रोंआ सिहर उठता ….. कि भहरा के गिर न जाँय सन?

एकर जबाबों मन अपनही लप्प से हेर लेता,’ बाँड बाँडो जइहें आ नौ हाथ के पगहो ले जइहें’। मर मरा गइलें त ठीक ना त भर जिनगी बीपत से लड़त फिरिहें। बाकि उहाँ से चाहियो के केहु भाग ना सकेला। भींड भागे के मोका ना नु देवेले। दाएँ-बाएँ हिले तक के मोका ना देवेले। जरिकों एने-ओने भइला पर आफत कपारे।ओही में धसोरात चलत रहला का छोड़ कवनों दोसर जोगाड़ ना भेंटाए के बा।आजु एही भिड़िया में दुरगा देवी के देखनी ह, त देखते रह गइनी ह। बड़-बड़ आँख, सुगा के ठोर लेखा नाक आ दमकत लिलार। लाल चुनरी में सजल सुन्नर-सुघर मूरत। हम एकटके ओह टेक्टरवा का ओरी देखे लगनी जवना के टाली में देवी जी राखल रहनी। कुछ लोग ओह देवी के मूरत के थम्हले रहलें आ जयकारा लगावत रहलें। रहि-रहि के भिड़ियो पर चिचियात रहलें- ‘ हरे हे !हटा भैया एक ओरी कंहवा घुसल आवत हउआ लोग।’
देख..देख ई ससुरा रेक्सा वाला के …एकदम्मे कपारे चढ़ल आवत ह।दुई थपरा मारब त इंहवें चारो खाने चित होई जइहन।” गुसियाय के पान थूकत एक मिला चिचिआइल।

‘अरे हे बूढ़ा! कंहवा सटल आवत हऊ।अबहिएँ चँपा जइबू न त तोहंके त केहू कुछ न कही। हमनिए के जेहल होई।’ एगो बूढ़ मेहरारू के सड़क पार करत देखिके  टेक्टर के डाइबर डांटलस।

‘ हऊ देख रे मर्दे..तनी ओहर देख।एकदम्मे पटाका लागत हईं सन।तनी मुँहवों देखावा ए सहर क लाली ,बिहार क लाला देखे खातिर बेकरार बाड़न।”
पसीना से नहाइल, जाम से स्कूटी निकाले में लागल लइकिन के देखि के एगो चुडुक्का बोली बोललेस आ ओकरा संगे के कूल्हि दाँत चियार के हँसे लगलें।

‘ए भइया मूर्तिया केतना में पड़ल हे?” ऑटो वाला अगरा के पूछलेस।
” तीस हज़ार में।” टाली में से एगो लइका उचक के बोलल।
” काहें झूठ बोलत हउआ यार।पंद्रह -बीस हज़ार से ढ़ेर क न होई।हमरहु इन्हा खरीदाइल ह..हमहनों के पता होला।”ऑटो वाले के व्यंग के भाँपत टाली में कई लोग जे मूरती के पकड़ले रहे चिचिया के बोल उठल-

” तनी मइया क सइजवो देखा।पाँच फुट क मूरत ह।एतना नीक चुनरी अउर गहना ह। पइसा ना लागी का ?” टाली वालन आ ऑटो वाले में तब तक तू-तू मै-मै होत रहल जबले टेक्टर थोड़ा आगे नाहीं सरक गइल।

देवी के जयकारा के जगहा उनका मोल चुकवला के चरचा होखे लागल।हम सुनत आ देखत रहनी  शक्ति के अधिष्ठात्री देवी के जिनकर आँख अभियो ले सुन्नरे रहे। अभियो मोहिनी मुस्कान ओसही रहे बाकि हमार सोच नीमन ना बाच पावल रहे जे अब माई के सुघरई के मोल ओकरे कीमत से करे लागल रहे।
‘तीस हज़ार में त  बहुते नीमन मूरत मिल जात…ठगा गइला जा गुरु तोहन लोग ।’ऑटो वाले के सुर में सुर मिलावत हमार मन हमरे बस में ना रहे पावल।

बाकि… अइसन सोचलो पाप ह। माफ करब दुरुगा माई |’

 

मूल रचना- हिन्दी (डॉ सुमन सिंह)

भोजपुरी भावानुवाद- जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

(17/10/2020)

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