मानवाधिकार मने रक्षा कवच बाक़िर केकर ….?

का जमाना आ गयो भाया, जेहर देखा ओहरे नटई फ़ारत कुछ लोग देखाइये जा तारन। माने भा मतलब कुछों होखे उनुका चिचिअइले से फुरसत नइखे लेवे के। सभे के आपन-आपन हित बाटे, केकरो अपना दोकनियों के चिंता करे के बा, त केकरो अपना जेब के चिंता बाटे। तनि हई न देखा, सभेले बेसी उहे नरियात देखात ह जेकर ई कुल्हि कइल-धइल बाटे।उनही के आंटा, उनही के घीव, कमरी ओढ़ि के झींक के पियतो बाड़ें आ दोष तवन दोसरा के लगावत बाड़े। आ क़हत का बाड़े कि इनका वोजह से हमरा के घीव पीये के पड़ल ह। भइया खाँटी घीव सभके पचबो त ना करेला, अब पेट में मरोर उठता त ओहू में दोसरे के दोष बा।कुछ लोगन के नल्ली चालू हो गइल, त उहो दोसरे के दोष बा। एहनी लोगन के हिसाबों कुछ अलगे रहेला। एकरा पाछे कारन बाटे, एह घरी मानव कहाए के जोगता बस एही लोगन का लग्गे बाटे। शेष लोग का बा, उहे लोग जाने। हमनी के ना नु बुझाई। दोसरा लोग भलही सब कुछ नीमन करे, बाक़िर दोष त लगही के बा। काहें से कि उहे लोग मानव बाटे,एही वजह से ओह लोगन के मानवाधिकार के हनन हो रहल बा।फेर बताईं चिचिआइल गलत कइसे भइल?

सुनी सभे, एह देश के खाँटी बुद्धिमान लोगन का हिसाब से मानव उहे बाटे जे चोरी, हत्या, बलात्कार, डकैती, बदमासी, छेड़खानी, छिनैती करत होखे, आतंकवादियन के पोसत होखे भा खुदे आतंकवादी होखे, दंगा-फसाद में ओकर डंका बाजत होखे।अब अइसन लोगन के पुलिस पकड़े, मारे भा जेहल में बन्न करी त मानवाधिकार के हनन होखबे नु करी। मध रात में कोरट खोलवा के स्थापित आतंकवादी के मोकदमा के पैरब्बियो कइल मानवाधिकारे कहाला भा संविधान सम्मत बाति बतावल जाला। सेना, पुलिस भा आम मनई, मेहरारू भा लइकी मानव का कटेगरी में ना आवेला लो।एहनी लोगन का साथे कुछों होखे, ओहमें मानवाधिकार के हनन होखबे ना करे, एही से खाँटी बुद्धिमान लोग चुप रहेला। नबालिक लइकी के बलात्कार करिके उ लोग जियते माटी के तेल भा पेटरोल डालि के जरा देवेला तबों मानवाधिकार पर असर ना होखेला, बाक़िर अगर अइसन करे वाला लोग पुलिस के हथियार छीनी के हमलो करे आ अपना जान बचावे में पुलिस के गोली से मरा जाला त मानवाधिकार के हनन हो जाला। फेर त खाँटी बुद्धिमान लो, खाँटी पत्रकार लो आ खाँटी साहित्यकार लो आपन-आपन खटकरम शुरू क देवेला। लमहर-लमहर अखबारन में लीपा-पोती त होखबे करेला, मोमबत्ती गैंग मुँह पर लिपिस्टिक पाउडर पोत के मारच पर निकल पड़ेला। डिजाइनर पत्रकार लो लामा-लामा बकलोली बुद्दू बाकस में बइठ के बघारे लागेला आ जुगाड़ू साहित्यकार लो जुगाड़ से मिलल सम्मान लउटावे लागेला। कुछ लोगन के ई देशवे रहे लायक ना बुझाला। ओह लोगन के मेहरी दोसरा देश जाये खातिर रोहा-पिटी करे लागेली। बाक़िर कहीं जालीं ना।

मनराखन पाड़े के जोगाड़ जब से गड़बड़ाइल बाटे, तबे ले ऊ लोग फुल बकलोली पर उतर गइल बाटे। सरकार कतनों नीमन बात करे, नीमन काम करे, ओह मनराखन पाड़े के कुल्हे बाउर बुझाला। एही से आठों पहर बकबकात रहेलन। कबों आलू से सोना बनावे लागेलन आ कबों अढ़ाई हजार पाँच सौ के गीत गावे लागेलन। मनराखन पाड़े के हाल त ई हो गइल बाटे कि उनुका अपना नांवों के लेके कबों-कबों भरम हो जाला। मन के कुंठा गवें-गवें बहरिया रहल बाटे। जब मोका रहल तब हरदी ना लगववलें, अब हरदी खातिर फेफ़ियात फिर रहल बाड़ें। आगु 10-5 बरीस उनुका हरदी मिली कि ना, कवनों पंडित भविसबानी करे से जान बचावत बाड़ें। ई उहे पाड़े बाबा हवें जे हर काम का कमी-बेसी दोसरा पर डारत आपन गरदन झारत गोड़ दबा के खिसक जालन। मनराखन पाड़ें एह घरी एतना कनफुजियाइल बाड़े कि रात-दिन से लेके हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बीच के फरक नइखे समुझ पावत। आपन भाषा बोले खातिर इनका लग्गे शबद नइखे, जे जवन इनका मुँह में ठूँस देता, ई ओकरे ओकाये लागत बाड़ें। बोलत बेरा कबों इमरान खान के भाषा बोले लागत बाड़े त कबों हाफ़िज़ सईद के भाषा। राति के उनुकर माई कतनों समुझावत बाड़ी बाकि उनुका पल्ले कुछों पड़ते नइखे।बुझाता कि ऊपरा वाला मोहल्ला एकदमे खलिहा हो गइल बाटे।

बात अतने तक रहत तबो ठीके कहात बाक़िर एगो मोटा भाई इनका भागि में सनीचर लेखा आके गोड़ तोड़ के बइठ गइल बाड़ें। कबों मंदिर वाला मंतर, त कबों 370 वाला मंतर, त कबों कउनो आउर मंतर। अब फेर से एगो नया मंतर लेके बइठ गइल बाड़ें, ‘नागरिकता संशोधन’, मने साढ़ेसाती उहो गाय-बजाय के। अब मंदिरो जाये लायक नइखे बाचल मनाराखन पाड़ें आ महाजिद में लोग उनुका हेलही नइखे देत। बड़ आफत घहराइल बाटे बेचारु के कपारे। एह आफत के मार अतना बरियार बाटे कि मनराखन पाड़ें सही जगहा के र

.हतो भुला गइल बाड़ें। चहुंपे के बाटे केकरा दुआरे आ चहुंप जातारें दोसरा के दुआरे। आ उहवाँ चहुंपते थू-थू मचि जात बाटे। उप्पर से मोटा भाई के मंतर, मति कहीं कटले पर नून दरेरात बुझात बाटे। अब केकरो कटला पर नून दरेराई त चिचिअइबे नु करी। ओह घरी कहाँ पता चलेला कि चिचिआये वाला का बोलत बाटे। तब ओकरा मानवाधिकारे सभे से नीमन मलहम भेंटाला। अबहीन 370 वाला परपराहट पटाइले ना रहल तबले अगिला मंतर संविधान आउर धरम के चिकोटी उहो दाँत गहिराह बले गड़ा काटि दियाइल। फेर चिचिआइल कइसे बन्न होखी।

कवनों-कवनों बाति के सकेराहे निपटावे में मोटा भाई के धाह हैदराबाद ले चहुंप गइल। बेचारु मनराखन पाड़ें के जीयल मोहाल भइल जात बाटे। ई सिंघम वाली कहनी के भर देश में सोवागत भइल बाकि मनाराखन पांडे के घिघ्घी बन्हा गइल बाटे। बेचारु के साँप-छुछुन्नर के हाल हो गइल बाटे, न निगलते बनत बाटे न उगिलते। निगलला पर मुअला के खतरा आ उगिलला पर आन्हर भइला खतरा, मनराखन पांडे बउवात फिर रहल बाड़ें। मोटा भाई अपना मंतर से कुल्हि गड़लका मुरदा उखाड़ रहल बाड़ें। एह घरी मनराखन पाड़ें के बस सगरो एकही गो बाति लउकत बाटे-

‘पुरबुज के इजत पर पानी रोज फिरत हौ बाबूजी’

       मनराखन पाड़ें खातिर कुल्हि मलहम बेअरथ के बुझा रहल बाटे। कबों-कबों कुल्हि मलहम एक्के में मेझरा करि के अजुमावे कोसिसो काम ना आवेले। एहु घरी उहे हो रहल बाटे। मानवाधिकार से लेके संविधान तक के दोहाई दे देके थाक चुकल मनराखन पाड़ें अपने करम के कोस रहल बाटें आ मोटा भाई अपने मंतर के आउर चोखगर बना बना के अजुमा रहल बाड़ें आ पबलिक खेला देखि-देखि के मजा ले रहल बाटे।

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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