माटी क जाँता

कातिक पुन्वासी क दिन सबेरवै से साफ सफाई मे लगल रहली।छुट्टी क दिन रहेला त अउर काम बढलै जाला, अबही कपड़न के घाम देखावै के बा ।चारू अक्षत गरे से लिपट गइनै । “अम्मा घूमे चला।”
” कहवाँ चली हमार राजा बेटा”
“माल चला न।”
अच्छा ठीक बा….।
हमार चार साल क बेटा के माल जाये के नशा सवार रहेला।
हमहू जैइसे -तइसे काम समेट के दोनो बच्चन के लेके चल दिहनी।शहर मे भीड़-भाड़ बढ़लै जाला।सबके जल्दी जाये क अइसन होड़ मचल रहेले की पुछा मत। बनारस क जाम त मन के सारे जोश पर पानी फेर देला।
सड़क के दूनो ओर दूकान सजल बा लाई -चूरा, मिठाई खिलोना रगं -बिरंग के झालर लगल बा।त्योहार के वजह से शहर प बहुत दबाव देखात बा।चाहे जवन त्योहार हो बनारस मे ओकर असर अलगै छटा देखाले,अउर आज त देव-दिवारी बा। ये शहर क खास दिन। जइसे लगत बा आज के दिने इहाँ क जनता-जनार्दन ही ना,वरन मानल जाला कि स्वर्ग से देवतागण धरती पर उतरैन।
मन ही मन सोचै लगली कि धरती के लोगन से वैइसही जीयब मोहाल भइल बा,अब स्वरगे से भी लोग आवै लगही तब का होई…..।
चारू गाड़ी रोका-गाड़ी रोका चिल्लाये लगली,अब का भईल?ह म पुछे लगली….।हम हउ लेब….।सड़क के वो पार एक दुकान मिट्टी के खेलौना से सजल रहल,वही तरफ अंगुरी से इसारा करै लगल। हमहू डाईवर से गाड़ी साइड मे लगावै कह के ,पर्स मे से 100रू क नोट निकाल के पकड़ावत कहली जा शंकर चारू के जवन चाही खरीद दीहा।चारू मटकत शंकर क हाथ थाम चल पड़नी। हम अक्षत के रंग -बिरंग झालर देखावै लगली।
तभी चारु हमरे हाथे पर जाँता (माटी क खेलौना) रख के कहै लगल एक रूपिया भी कम ना कईनै पुरे पैतीस रू पिया क देहनै है।हम अपने हाथे मे जाँता देख हतप्रभ रह गई ली।पालिश कयल बहुत सुघर इ माटी क खेलौना हमरे अतीत के याद के गुदगुदा गइल।
हनुमान गढ़ी के पोखरा पर आज मेला.लगल रहें।सुबेरे से ही हम सब भाई बहन।हमलोगन क बाडीगार्ड यानि हमलोगन क नौकर लालमनि हमसभी बच्चा पार्टी क होनहार रक्षक।बाबू जी सबके 10-10 रूपिया देके बहुत सारी हिदायत के साथ हमनी के लालमनि के सुपुर्द कय देनै।केतना उत्साह जैसे दश रुपिया ना बलुक कुबेर क खजाना हमने के मिल गइल हो। हम लोगन मे सबसे तेज ललमनिया के पास बहुत सारा समान रहे
बन्दूक ,घोड़ा ,बँसुरी।उ हमनी के एकजगह खडा़ कइके जाय अउर आवै त हमेशा हाथे मे एक नयी चींज लेहलें रहैं।सब लोगन के एसे मतलब ना रहे लेकिन हमरे बालपन के बुद्धि मे इ हजम ना हो।’हे लालमनि तोहरे पास एतना समान कईसे।’उ आँख मटकावत बोलल।.ई झटकन बिद्या ह।ई कवन बिद्या हमरे समझ के बहरे क बात रहल ,तब उ गुरू बशिष्ठ के नीयर बिद्या क रूपरेखा बतावै लगल।
“जब केहू के दुकान पर जा पहिले इधर-उधर देखा-ताका जवन तोहें समान पसंद हो ओके उठा के देखा अउर पूछा भइया इ केतने क ह? फिर इधर-उधर देखा अइसही दू-तीन बार उलट पुलट के देखा समान लेके जल्दी से उहाँ से भाग ला। यही के झटकन विद्या कहल जाला। हमें ई विद्या बड़ा असान लगल अब हमरहू पास बहुत खेलौना हो जायी, इहै सोचत -सोचत हम अपने टीम से तनि दूरे निकल अइली। तबले एकाएक हमार नजर माटी के खेलौनन के दुकान पर पड़ल जहाँ एक अधेड़ उमिर क औरत बेचत रहल।माटी के जाँता पर निगाह जाकर थम गइल अब का झटकन बिद्या हमरे अन्दर उछाल मारे लगल,मन कउनो गजे न मानै, रोक ले न रूके ।हम ओकरे करीब जा पहुचली,दुकानी पर कउनो गहकी ना रहल।उ औरत से हम पुछै लगली ये चाची “,
इ जाता केतने क ह।”
ले ला बच्ची..बीस पइसा क ह,
नाहि महंग देत हउ।,
अच्छा पाँच पइसा कम दिहा।
अच्छा।।
हम जाँता हाथ ले के इधर-उधर देखली(जैइसन हमार गुरू बतवलै रहनै)लेकर खिसक लेहली तब ले उ चिल्लाइल ये लइकी जाँता ले के कहाँ जात हई..रूक..रुक।हम जाँता लेके भागै लगली ,हम आगे-आगे औरत हमरे पीछे पीछे हे लड़की कहत जाय।अब हमरे कुछ समझ मे ना आयल काहे के कि बिद्या मे ई स्टेप ना रहै। ई का हो गइल। हम भागत भागत हसन के चबुतरा तक जा पहुचली अबहिनो उ हमार पीछे भागत आवत हिए।भीड़ हमें देखत हिये,जाँता वही चबुतरा पर छोड़के हम भाग खड़ा भइली।
चारू हमार हाथ पकड़ के हिलावत हयी अम्मा देखा न केतना नीक ह, सुघर ह, हम चेत मे अइली जाँता हाथे मे ले के मुस्कियातै रह गइली।।

  • डॉ ऋचा सिंह

हरिचन्द्र महाविद्यालय वाराणसी

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