माटी के सोन्हगर महक में सउनाइल ‘हूक-हुंकारी’

जब चारो-ओरी से उठत अवाजियन का उत्तर में कवनों किताब उपरियानी सन,त सहजे में सभे के अपना ओरी खींच लेनी सन। आजु भोजपुरी के युवा लेखक लोग अपना लेखनी से हर बातिन के बरियार जवाव दे रहल बा लो। एही से भोजपुरियो में निबन्ध, शोध आलेख आउर कहानियन के किताब छप रहल सन। महिना दू-महिना का भीतरि डॉ सुमन सिंह के 4-5 गो आइल किताबियन का हम एही रूप में देख रहल बानी। कई बरीस के कइल कामन के सहरियाय के ओकरा किताब का रूप दीहल, साँचो भोजपुरी माई के अँचरा में खोंइछा लेखा बुझाइल ह।

भोजपुरी में साहित्य लेखन आ लेखन का पुस्तकाकार रूप में परोसल धन का माथ पर लात देके, अपना कई गो इच्छन के हुरपेटत किनारे लगावत माई भाषा भोजपुरी खातिर भइल कवनों परयास सराहे जोग होला आ सराहलो जाला।भोजपुरी के ढेर साहित्यकार लोगन के इहे कहानी ह। एही से सरकार का अंदेखियो का बाद भोजपुरी माई क साहित्य भंडार भर रहल बा, अजुवो ई बाति सोरहो आना साँच बा। डॉ सुमन सिंह भोजपुरी माई के एगो अइसने बिटिया बानी जे अपना लेखनी के धार से सभे के अपना लेखन पर सोचे-समुझे-बूझे खातिर झकझोरत रहेलीं। आजु के समय में भोजपुरी लेखन के एगो बरियार उमेद बनि चुकल डॉ सुमन सिंह के भोजपुरी कहानियन के संग्रह के पहिलकी किताब ‘हूक-हुंकारी’ भेंटाइल ह। डॉ सुमन सिंह के ई किताबि सपने साज-सज्जा आ छपाई से सभे के ललचावत बिया, देखते मन हुलस उठल। अंउजहट का चलते एक दिन ना पढ़ सकले के मलाल भइल, बाक़िर दोसरका दिने जबले पढ़ ना लिहनी, चैन ना भेंटाइल।

डॉ सुमन सिंह के कहानी संग्रह ‘हूक-हुंकारी’ 14 गो कहानियन का संगे 3 गो बतकुचनों बा जवन केहुओ के मुस्कियाए खातिर बेबस कर देत बाटे। कई गो कहानियन में भोजपुरिया समाज खास क के बनारस के आसपास मने काशिका में दुलार में बोले जाये वाला शबद जइसे मरकिनवना,उफ्फर परा, पिलुआ परो, … कवनों पाठक के गाँव के इयाद टटका करावे ला आ हंसावे ला काफी बाटे। पूरे कहानी संग्रह के भाषा पश्चिमी भोजपुरी (काशिका) बाटे।डॉ सुमन सिंह के कहानियन के पात्र जदा-कदा गाँव-जवार में भेटा जालें। मंतोरना फुआ आ बेकहला जइसन चरित्र ऊ होलें जे आपन घर-संसार न बसा सकला के पीड़ा के जीयत दोसरा खातिर आपन पूरा जिनगी अरपित क देवेलन। दुलहिन भा बुचिया एह लोगन का नेह-छोह ना बन्ह पावेली। एह लोगिन के अपना काम से मतलब होखेला।एह संग्रह के सगरी कहानियन का पृष्ठभूमि में गाँव,गँवई संस्कृति आउर ओकरा के जिये वालन का बीच से पात्र लीहल गइल बाड़न। विज्ञान का एतना फइलाव का बादो गाँवन में भूत-परेत, दइतरा के लेके ढेर अन्ध बिसवास बाटे। नरियर बाबा के भूत भा जादूगरनी कहानी में ई कुल्हि नीमन से उकेराइल बाटे। जादूगरनी में भूता परेता का चक्कर के चलते इलाज ना करवावल सोनी का चाची के जिनगी पर बनि आइल आ जिनगी ना बच पावल। ‘कुलदीपक’ कहानी अपना बड़-बुजुरगन का संगे हो रहल अनदेखी आ अपमान के बड़ साफ़गोई से उजागिर कर ता। आजु के समाज के नैतिक पतन क साँच सबके सोझा राखत बाटे।’कहे के सब केहू आपन’ आ ‘नौटंकी’  कहानी टूटत-बिखरत परिवारन का बीचे मुअत रिस्तन के सटीक दस्तावेज़ ह। नवही पीढ़ी आ पुरनकी पीढ़ी का बीचे बढ़त दूरी आ एक-दोसरा से दुराव के स्थिति बखानत कहानी ‘फो ….रन…..सी…रन’आजु के समाज के एगो इहों रूप देखा रहल बाटे। ‘करमदाता। कहानी का माध्यम से कहानीकार डॉ सुमन सिंह मनाई के जोगता आउर ओकरा मेहनत मसक्कत के कसमकस पर क़िसमत के चक्कर के भारी होत देखावे में पूरा कामयाब भइल बानी। गायत्री घर-स्कूल में खटला का बादो कवनों अइसन आधार बना पावे में समरथ ना हो पावत बानी। एही से उनुका कहे के परता ”कि एह संसार में केहू-केहू क करमदाता ना ह। सब अपने-अपने भाग से खाला पहिरेला। करमदाता उहे ह जे संसार में हमनी के भेजले ह।”

एक-दोसरा के बढ़न्ति के देखल आ ओकरा के सराहल सबके बस के बाति ना होला। अकसरहाँ ई देखल जाला कि जारे-बुताये वाला लोग रिस्तनों के फिकिर ना करेला लो। अइसन लोग बस निन्दा करे जानेला आ दोसरा के चरित्र पर कनई बीगेला। अइसन लोगन के जब साँच पता चलेला त आपन मुंह छुपावेला आ दोसरा के दिल दुखावत आगु बढि जाला। ‘आँखि किरिया’ कहानी एह बाति के स्थापित करे में सफल बाटे। ‘बउरहिया’ टूटत सामाजिक ताना-बाना आ छीजत रिस्तन के कहानी ह, जवन परम्परा के देखावा करे वाला लोगन के असली चरित्तर उजागिर कर रहल बिया। अन्हरा बिना रहियो न जाय आ मउगा चच्चा गँवई समाज के अधकचरी सोच उजागिर कर रहल कहानी बानी सन। आजु एकाकी हो चुकल परिवारन में नवहा लइका-लइकिन के अनदेखी, अकेलापन आ जरी-मनी कतौ से मिलल नेह-छोह उनुका रसता भटका देवेला। महतारी-बाप से आजु-काल्हु के नवहा खुल नइखी पावत, एही से ऊ आपन बाति नइखे बता पावत। फेर जब परिस्थिति उनुका मोताबिक ना रहि जाले, त उनुका गोड़ उलटा-सीधा पड़ल सोभाविक बाति हो जाले। ‘परेम-वरेम’ कहानी क पात्र मन्नू आ स्वीटूक हालत कुछ अइसने बाटे। ओह स्थिति में महतारी सीमा भा यूएनयूकर बाबूजी के कुल्हि परयास बेकार हो जात बाटे। कहानी के अंतिम में मन्नू का दोस्त रूप में दीपू क आइल स्थिति के सम्हार लेत बाटे आ मन्नू के कपारे से स्वीटी के परेम-वरेम के भूत उतर जात बाटे। नाही त जवन अंतिम में मन्नू कह रहल बाड़ें-“हाँ यार दीपू सही कह रहे हो यार। ये साला प्यार-व्यार फालतू की चीज है। इसके चक्कर में हम तो बर्बाद हो गए थे …. बचा लिया तुमने आज तो नहीं तो गुस्सा-गुस्सी में ससुरी जान चली गयी होती अब तक।”, कहियो न पवतें।

कुल मिलाके देखल जाव त डॉ सुमन सिंह अपना कहानियन से जवन-जवन बाति उठवले बानी, ओह कुल्हि बातन से समाज के एगो बरियार सनेसा देवे में सफल भइल बानी। कहानियन के बनावट-बुनावट अइसन बाटे कि जे एक बेरी किताब का पढ़ल शुरू करी, ऊ जबले ओकरा ओरवइले बेगार चैन नइखे पड़ेके। एही से हमरा ई लागत बाटे कि ‘हूक-हुंकारी’ के पढ़वइया लोग हाथो-हाथ लेही। कहीं-कहीं प्रूफ के गलती जरूर बाटे, बाक़िर ऊ कहानियन के बहाव के रोकत नइखे। एकरा साथे हम विदुषी कहानीकार डॉ सुमन सिंह के बधाई आ शुभकामना दे रहल बानी आ ई उमेद कर रहल बानी कि डॉ सुमन सिंह के लेखनी दिन पर दिन आउर चोखगर होत रही आ ऊ भोजपुरी माई के भंडार भरे में कवनों कोताही ना करिहें। उनुकर उपस्थिति से जवन भोजपुरिया साहित्यकारन का बीचे एगो उमेद जागल बाटे,ओह उमेद के बिरवा फरत-फूलत एगो बरियार बरगद बनी।

 

पुस्तक का नाम- ‘हूक-हुंकारी’

कहानीकार- डॉ सुमन सिंह

मूल्य- रु 200.00 मात्र

प्रकाशन- सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली

-जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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