केहू खातिर बैंगन पथ्य आ केहू खातिर बैरी

का जमाना आ गयो भाया,फुलौरा के नावों लोग भुला गइल। शहरन मे ओकर कुछ दोसरे नाँव राख़ लेले बा लोग। के जानी दही बड़ा बोले लागल बा लोग। आगु बढ़ला के फेर मे कई बेर जान बूझ बुरबकाह बनेला लोग। एह सगरी बातन के पाछे अगुवा बने के सपना होखेला। बाकि कहाउत त जस के तास बा, अजुवो ढेर लोग बेमतलबो के आपन मुँह सुजा के फुलौरा अस कइले रहेला। ई कवानों जरूरी नइखे कि मुँह फुलौरा अस बनावे के पाछे बाउरे बाति होखों, ढेर हाली लोग नीमनो बाति हो सकेले। कई बेर नीमनको बतिया के लोग घोंट ना पावेले, गरही मे अटकि जाले,फेर मुँह फुलौरा अस बनही के बा। वइसे त ई कवनो लमहर बेमारी नइखे बाकि कई बेर लमहरों से लमहर बेमारी अस हो जाला। कई बेर मान-मनुहार से ई बेमारी दूर हो जाले आ कई बेर जस के तस बनल रह जाले। कई बेर दोसर तीसर उपाय लगावे के परि जाला, तब ई बेमरिया दूर हो पावेले। ई बेमारी अक्सर आपन कहावे वाला लोगन के होले आ गवें गवें ढेर लोगन के अपना चपेटा मे ले लेवेले। डागदर-बइद लोगन के लग्गे एकर कवनो रामबाण इलाज नइखे। उहो लोग एह रोग के बेमरिहन से वसूली करत रहेला आ दुवार छोड़ावे खाति भगवान से भीख मांगत रहेला। विज्ञान के एह जुग मे ढेर बेमारिन के इलाज खोजा गइल बाटे। बाकि एकरा खाति अबहियो ले भगवाने भरोसे सब कुछ बा। ई अपने किसिम के एगो अइसन भितरिया बेमारी बिया जेकरा बारे मे केकरो से बतावलो ना जाला। मरीज बेचारा मने मन घूंटत रहेला। जेकरा कारन ई बेमारी ओकरा के धइले बा, ओकरे विनाश खाति मंदिर आ मजार पर मुड़ी पटकत रहेला। सोझा पड़ले पर जबरी मुसुकी भा बतीसी देखावल ओकर मजबूरी बनि जाला।

 

जहवाँ कुछ लोगन के ओही कारन से बेमारी हो जाला ओहिजे कुछ लोग अइसनो भेटालें जेकरा जिनगी मारे खुसी के हरियर हो जाले। उ लोग अशीसत ना थाकेले आ सोझा परले पर धधा के मिलेले। कहलो गइल बा “केहू खातिर बैंगन पथ्य आ केहू खातिर बैरी”, समय के हिसाब से अजुवो ठीके बा । अब जब बैंगन के जिकिर हो गइल बा,त एकर महातिम रउवा सभे जानते बानी,जानहूँ के चाही। काहे से कि पथ्य भा बैरी के बात त तब होखी जब रउवा खाएम।कुछ लोग त खइबो ना करेला तबो एकरे संगे सउना जाला। मने बेकार मे नाँव एकरा संगे सट जाला। अजुवो ढेर लोग एह लेखा मिल जाला। कब उ भोजपुरी के बा आ कब हिन्दी के बन जाई,पता ना चल पावेला। फेर सफेदपोश बनि के “हिन्दी दिवस” मनाई भा गमछा ओढ़ी के भोजपुरी के माला जपल उनुका आदत बनि जाला। कागज के हरियरी से अपना के बचावल ढेर पहाड़ काम बा। हरियरी मे मन अझुराइए जाला, आँखि के सुख सभे चाहेला।

दोसरा के सनमान कइल नीमन बाति बा, बाकि एक के आहुति देके दोसरा के सनमान हमरा नीमन ना बुझाला। देश हित आ समाज हित के फेरा मे मन ऊभ-चुभ हो जाला। देश के सनमान होखे बाकि कुछ के लाश के ढेरी ठाढ़ होखे, एकरा खाति मन के समुझावल आ बेगर चिनिया बेमारी के करैला के रस चाभल नरेटी के भीतरी ना घुसे। मुखौटा लगा के भा कमरी ओढ़ के घीव पीये के करतब सबके बस के रोग नइखे। आजू के समाज मे ढेर लोग अइसने बा। अइसनका लोग त इहे नु करेला –

 

हिन्दी-हिन्दी उहो क़हत हौ

हिन्दी गाई खोरी मे ।

कबले बनी राष्ट्र के भाषा

न कबौं सुनाई खोरी मे ॥

 

70 बरीस से खेला चल रहल बा। दोसरा के हिस्सा के मलाई चाभल जा रहल बा। विकास के नाँव पर अपने कुटुम के हित जोहात बा। जबरी मातृभाषा लिखवा के भीड़तंत्र के खेला, खेलीं खेलीं महाराज, राउर काम बा झमेला। चिट्ठी लिखी, गोल बना के केकरो से मिली भा गलथेथरई करीं,साँच त साँचे नु रही। कुतर्क ढेर दिन ना चल पावेला,कतनों गढ़ीं,कइसनों गढ़ीं। अब ले त गद्य नइखे,व्याकरण नइखे,मानक नइखे करत रहनी ह, अब यू एन के माला जप रहल बानी। राष्ट्रभाषा के नाँव पर काहें कीरा सूँघ लेता जी, 70 बरीस मे जवना भाषा के रोजी-रोटी के भाषा बन जाये के चाहत रहे, ओह भाषा के आज खतरा काहें बुझा रहल बा?1000 बरीस पुरान भाषा के अस्तित्व के नकारे मे लागल बानी।बाकि राउर सफलता के सवाद ना मिली, इ बतिया काहें ना रउवा के खोपड़ी मे घुसत बा। एगो कहाउत बा – “भाई के अंश,गलहंस” ! इहवाँ त रउवा माई के अंश घोंटे के फेरा मे लागल बानी।

जड़ के मजगुती से फेंड़ कमजोर ना होखस आउर लहक के छांह देवेला। जवन भाषा बेगर कवनों सहजोग सभेले तेज बढ़त भाषा बिया, ओकरे शरण मे आईं,राउरो भला हो जाई। ई बतिया “प्राइम टाइम” पर ना सुननी का जी। रबीस जी के संगे “लिंगविस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया” के अध्यक्ष जी जब बतावत रहने, त कमरी ओढ़ के घीव पीयत होखब, एही से ना बुझाइल। समय आ चुकल बा, जेकर जवन बा,ओकरा के देही आ आपन काम मन लगा के करीं, रउरो के भला होखी। ई बाति ना बूझब त एना पारी भइस एतना गहिराह पानी मे जाई कि रउवा भेंट ना पाएम।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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