आलोचना मने बिरोध कि चरित्र हनन…?

का जमाना आ गयो भाया, सभे अपनही मुँह मिया मिट्ठू बनत फिर रहल बाटे। बिरोधी पार्टी के भइला का नाते नीमन बाउर सभे बातिन के बिरोध कइल धरम बनवले लोग अपने भाषा के स्तर कहाँ ले गिरा लेलन,ओह पर आजु कुछ कहल मुँह ऊपर क के अकास में थूकल बराबरे कहाई। मने कनई में पत्थर फेंकला जइसने होखी। ओकरा संगे अइसन उदाहरण परोसल जवन केकरो के ई कहे के मजबूर क दे कि ‘कहाँ राजा भोज आ कहाँ गंगुआ तेली’। देखी-देखा उहो करे लागता, जेकर मुँह अइसन मुँहो न होखे। अइसनका लोग आजु के समाज में लमेरा अस जामल बा जे आम लोगन के जिनगी में उथल-पुथल त मचाइये रहल बा, संगही एह लोगन के मुखौटा आ पाखंड दूनों संसार में सभे के सोझा उजागिरो हो रहल बा। अपना मन के मठाधीश लो खाली राजनीतिए भर में नइखे, जिनगी के कूल्हिये छेत्र में बा। आउर त आउर अइसन लोगन से साहित्यो नइखे बाचल। भलही साहित्य कवनो भाषा के होखे।अइसनका साहित्यकार लोग कूइयाँ के बेंग लेखा अपना आगु  केकरो के ना बूझे। सार्वजनिक जगहियों पर अइसनका लोग उलटी ढेर करेला। कुछ लोग कहेला कि ई एगो बेमारी ह,जवन छठे-छमासे उपरिया जाले। अइसन  बेमारी  के मरीज भोजपुरियो में कुंडली मारके बइठल बाड़ें। बोलत बेरा सकल बिक्षिप्त लेखा हो जाला, देखे सुने वालन के सुवाद आ मन दूनों बाउर हो जाला। कहल त इहो जाला कि अइसनका लोग अपना बुद्धि-विवेक से बलुक दोसरा के कहलका से चलेला। अइसन लोगन के खाति रउवा अपना हिसाब से कवनो विशेषण दे सकेनी।

अतने भर बाति रहत, त कुछ ठीक रहित बाकि एगो आउर बरियार प्रेत एह घरी घुरिआइल बाटे। भोजपुरी के अस्मिता के दू दसक से एह प्रेत के प्रकोप के झेलत हो गइल बाकि ओकरा सेहत पर कवनो असर ना पड़ल। बाभन,बनिया,यादव जी आ दुका जी से होत माई, बेटी, बहिन, चाची, मौसी तक होत फलाना,ढेकाना के फलनिया,ढेकनिया तक के अपना लपेटा में ले चुकल बाटे। जेकरा के एह प्रेत से लड़े के चाही, उ लो एक-दोसरा पर आरोप-प्रत्यारोप लगावे में अझुराइल बा। भोजपुरी गीत-संगीत में पइसल अश्लीलता के जिमवारी साहित्यकार लोगन के होखे के चाहत रहे, बाकि उहो लोग ओकरा से  शुतुरमुर्ग लेखा आँख मून के रेट में मुड़ी घुसा के बइठ गइल भा अजुवो बइठले बा। अभियो अपने राग आलाप रहल बा, हम बड़का, हम बड़का।  अबरी त चोरवे के घरे डाका परि गइल बा, से चोरवा बिलबिलाइल बा आ धमकियो दे रहल बा, मने अब तुम्मोफेरी ओकरे? ‘शठे शाठ्यम समाचरेत’ आ ‘शठ सुधरहि सतसंगति पाई’ के विकल्पो लगावे में विवेक कम विशेष जेयादा देखाला। इहवों खेला बा, कुछ लो अइसनो बा खूब बाउर गवलस, अब छोड़ देले बानी कहला पर बड़का मंच। जे कबों ना गवले होखे, ओह मंच पर ठप्पा धारी आ जाव त ओह गरीब गवइया के छीछालेदर। चलीं ई भीतरी बात बा, एकरा पर बादों में विचार हो सकेला।

अब दोष आ दोषी के निर्धारन के सबके अलग-अलग पैमाना बा। बुराई के बिरोध में झिझक काहें? का भोजपुरिया लोगन में अतनों आत्मबल नइखे बाचल जे बाउर के बाउर कहि सके। कहाँ गइल गमछा-लउर के सोच वाला निठाह भोजपुरिया। केकरो खातिर मनराखन बनला के जरूरत नइखे। जे सुधरत बा ते ठीक, जे नइखे सुधरत ओकरा कुजात काढ़ीं महराज। करीं हुक्का-पानी बन्न। जगाईं अपना भीतरि सूतल अस्मिता के समझे बूझे वाला मनई के। ढ़ेर भइल गोल-गोलबंदी, अब चलाईं चकबंदी। बाकि आलोचना भा बिरोध के सुर सामाजिक हित के खाति होखे न कि आपन व्यक्तिगत खुन्नस के निकलउवल। गेनवा त अपनही पाला में बा, अब जगहीं के परी। एही में सबकर भलाई बा आ अपने मातृभाषा के मरजाद।

 

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

संपादक

भोजपुरी साहित्य सरिता

 

 

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