भोरे-भोरे अइहें हो सुगना

बिहँसेला अँखिया में लोर

कि भोरे-भोरे अइहें हो सुगना॥

 

अंतहीन जतरा पर कहिए निकललें

रहिया में खइका पानी ला तरसलें

चलि परलें गउवाँ का ओर

मजूरवा कहइहें हो सुगना।

 

रहिया में नइखे ओढ़ना बिछवना

रतिया बितावेला अकासे छवना

पिरात होई देहियाँ पोरे पोर

दरदिया पचइहें हो सुगना।

 

संउसे बिपतिया के हम ओढ़ लेबै

एही अँचरवा से आँखि पोंछ देबै

पकड़ि मोरे अँचरा का छोर

खूबे दुलरइहें हो सुगना॥

 

बिहँसेला अँखिया में लोर

कि भोरे-भोरे अइहें हो सुगना॥

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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