भुकभुकवा के छापाखाना

का जमाना आ गयो भाया,जेने देखी ओने से धुआं उठत लउकता। बुझाता पुरनका दिन लउट आइल बा, जब संझा होते छानी आउर खपड़ा वाला घर के बड़ेरी से धुआं उठत लउके लागे।मने घर के मेहरारू लो खइका बनावे में जुट जाय। नन्हका लइकन के खुसी त अलगे लउके लागे कि आजु हमार माई फलाना पकाई भा ढेकाना पकाई आ जम के भर पेट चाभब। एह फेरा में लइका दू गो बेसी काम धउर-धउर के क दे सन। बाकि ई जब से गैस आवे लागल,धुआं बिला गइल। मोदी अइले त ई गैस के गावें-गावें चहुपा देहलन। मने धुआं के लंका लगा देहलन। एकरा बादो एह घरी अलगे किसिम के धुआं उठ रहल बा, उहो मनरखना के घरे से त पुछी मति। न पाता ओकर माई का पकावे में लागल बिया। कुछ लोग त इहो क़हत भेंटाइल कि मनरखना आपन खइका खुदे पकावेला। ई होइओ सकेला, कवनों बड़ बात  नइखे। ओकर चरित्तर देखि के ओकर माई मनरखना के खइका बन क देले होखी। कुछ दिन त हीं-हीं दादी क के, मांग-चोंग के काम चलवलस बाकि काठ के हाड़ी एक्के बेर नु चढ़ेले।

ओइसे त मनरखना अपना के एगो बड़का साहित्यकार बुझेला। दू-चार बेर निहोरा के बेगर कुछ लिख के केकरो ना भेजेला। कइसे लिखेला आ का लिखेला ई बाति मनरखना के एगो पुरान संघतिया बतावत रहलें कि कवनों गूगल बाबा बाड़ें उनुका घरे में सेंध लगा के आपन काम चलावेला। कुछ लोगन का सोझा ई बाति कई बेर बोकर चुकल बा बाकि अपना के सभेले बड़ मौलिक मानेला। दू-चार गो अपनही लेखा लोगन के जुटा के हुल्लड़ई करतो भेंटा जाला। वइसे त मनरखना पुरान जुगाड़ू ह, इहाँ-उहाँ से जोगाड़ जोड़ते रहेला। जोगाड़ से त उ दोसरा के हिस्सा के मालो हड़पे के फिराक में लागल रहेला। मनरखना के उहे संघतिया क़हत रहलें कि जोगाड़ से त उ साहित्यकार बनल बा, फेरु जोगाड़ में पाछे कइसे रही।

कुछ दिन से मनरखना एगो दोकान खोल के बइठल बा आ कवनों साटिक फिटिक बाँट रहल बा। अपना दोकान के दुका-दुका बुझता, पते नइखे। कुछ नीमनों लो ओकरा दोकान के कबों-कबों चक्कर काट लेवेला,एही से ओकर मन बढ़ गइल बा। कहल त ई जाला कि ‘धन के बढ़ल ठीक,मन के बढ़ल ना’, बाकि मनरखना के एह घरी गोड़ जमीन पर नइखे पड़त, हावा में उड़ियात चलत देखाता। चिरकुटई में मनरखना के कवनों जोड़ नइखे। दू पइसा के खैनिओ माँगिए के खा लेवेला। तबो एह घरी कुछ पकावे में लागल बा। कादों गरम कड़ाही में पानी के छींटा मार के छौंक लगवला के झाँसा दे रहल बा भा कुछ आउर के जाने?

काल्हु संझा के तिवारी बाबा के पान के दुकनिया पर दू जने मनरखना के चरचा करत रहलें आ ओहमें से एक जने  पुछलें कि मनरखना उहे नु ह, जवन भुकभुकवा गरे में टंगले फिरेला? फेरु दोसरका जने मुड़ी हिला के हामी भरलें।

ई भुकभुकवा केकरा के कहल जाला, उनुका के फेरु पुछे के पड़ गइल। खैर उ अपना हिसाब से जवन कुछ समझवलें, ओकरा से बुझा गइल कि का कहल चाहतारें। उहें पता चलल कि मनरखना छापाखाना खोले जा रहल बा। दूनों जने के बात सुनि के तिवारी बाबा कह बइठलें कि ओकर नांव ‘भुकभुकवा के छापाखाना’ रखवा दी लोगिन। अतना सुनते उहाँ ठाढ़ सभे ठहाका लगावे लगल। हमरो ओह लोगन के ठहाका में सामिल होखल बाउर ना बुझाइल। अब रउरो सभे के बुझा गइल होखे त ठहाका लगाईं।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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