भकजोन्ही

बइठाका के इज्जत बहारन में ना फेंकाव, से सुँघनी लाल दिन-रात घर के मान बढ़ावे खातिर तेलोबेल कऽ लेलन। उनका घर में उनकर धरमपत्नी जी तनके साथे बेटा सुरुज आ बेटी सरोजो बाड़ी। लाला बड़ा तेज हवें। जब कहीं परिवार नियोजन के चर्चो सुने के ना मिलत रहे, तब्बे ऊ अपने परिवार के संख्या पर ब्रेक लगा दिहलें। सुरुज त सोंझ सड़की के सीधवा मुसाफिर हवें। ना नौ जानेलन, ना छव। एक बेर त ईऽ कहल जा सकल जाता कि उनके देंह बाप के गुन से कम आ महतारी के गुन से ढेर बनल बा। सरोजो एगो बेटी के धरम निभावे में टोला भर में एक नम्मर पर। सभे जानेला कि सुँघनीए लाल डेरा गइलें, ओहके पढ़े ना दिहलें, नात ऊ सरोजवो ई ए बीए पास हो गइल रहित ।गुनी त एतना कि ओहके गुन देखके बड़का-बड़का घर के बहुरियो लोग दाँतें अँगुरी दबावे लागेला लोग।

जीतन कम ना हई। साइत उनकर भगिए बहरा गइल रहलऽ जे ऊ सुँघनी के संघाती बनके एह घर में अइली। ओह बेचारी के रत्तियो भर तिरछोलई ना भावेला। ऊ तऽ सुँघनी के गइयों में हँ, भँइसियो में हँऽ। ऊ बेचारी त हर ऊँच का अथान के देवीए-देवता समुझ के अँचरा पकड़ के दसो नोह जोड़ लेली ।ऊ जेही जेठ-जेठानी के देखेली, आजुओ, मुड़ी के बार उजरो हो गइला पर, चमकत टिकुली ले घुँघुट सरकाइए लेली। ऊ मेहरारू भले पढ़ल-लिखल ना हऽ, कलम-दवात से भेंट ना हऽ, बाकिर ऊ बुझेली कि मेहरारू के गहना लाजे हऽ। जीतन में एह लाज के साथे सहुरो हऽ। चलला-फिरला, बोलला-बतिअवला, सबमें उनकर लाज झलकेला।

सुँघनी लाल तऽ अजबे लाल हवें। ना तीन में, नातेरे में। बेआर आह के बेओहार करे के कला केहू उनसे सीखेऽ। समय के साथे आपन आ बिरान में फरक डाल के ऊ आपन गाड़ी चलावे में माहीर हवें। बतीओ सहीए हऽ, अगर उनका में ईहो कला ना रहित तऽ चार कठा खेती लेके ऊ चार परानीन के गाड़ी केऽ तरे डगरइते? . . . ओहू में सुरुज बहरी पढ़ेलन।

विधाता सुँघनी लाल के साइत एही खातिर बनवलहीं बाड़न। काहें कि अइसन लोग तब्बे दाल गला सकेला, जब ओह में दूअछरियो ज्ञान होखे। ओकरा बोली से मन के मताऽ देबे वाला महुआ के रस चुअत होखे। ओके चेहरा पर हमेशा भोरहरीया के अँजोर फूटत होखे। अऊर ऊ तीत-मीठ, सब बातीन में चवनीया मुस्की छाँटत होखे। अदा अइसन कि सामने वाला तरस जाय कि ब्रह्माजी काहें ना अइसन हमरा के गुन दिहलन।

सुँघनी लाल बिधना के बनावल एगो अइसने जीव हवें। उनसे बजारी के दर्जन भर दवा दुकानदारन से ठेहुन भर चलेला। डंडी मारे वाला बनीयो लोग ललवा के देखते सलामी ठोंकेले आ मनुहारो करेंले कि अबकी बेर हमरे दुकान पर गोंहकी लाएब। सुँघनी लाल ओह लोगन के सलाम के जवाब में कमर ले आपन नटई नेहुरा लेलन। कपड़ा वाला मरवाड़ी से लेके, दर्जी, मोची, सबसे लाला के पटरी बइठेला। पहीले-पहील लाला भले ही परहित खातिर बाजारे गइल होइहें, बाकीर जब दुकानदारन से असीम आव-भगत पवलें तऽ होशियार हो गइलन। तबसे परहित में लछमीयों के आशीष भेंटाए लागल। लाला के एह कला से ढेर आमदनी भइल। अब उनके घर लिख से लाख हो गइल। जिनगी के रंग बदले लागल। उनके लइकनों के आँखि में एगो दोसरे ढंग के अँजोर होखे लागल। सही बात तऽ ईऽ रहे कि चदरा से बेसी पाँव पसराए लागल। मानल मन बड़ा जल्दी बहकेला बाकीर बहकल मन बड़ा धीरे से मानेला। दुनिया बदलत रहे। बदलत एह दुनिया में निपढ़ो लोग संसारिक बेओहार निभावे वाला बुद्धि तऽ जाने लगलन। सुँघनी लाल के दाल अब गलबे ना करे। खर्चा बढ़ गइल आ आवग कुछू हइए ना। बूढ़ होत छाती के बाती में एतना जाँगरे ना रहे जे अहरी-बहरी जाऽ के कुछ मेहनत कइल जाव। खैर, जे मुँह देहले बा, ऊ कवनो जतन तऽ करबे करी। भले आलसी लोग भगवाने के दोष देलन तऽ का हऽ, उनके शरण में तऽ सभे जाला। सबके ऊहे न देखेलन।

एतना दिन के अंतराल में बाजारी के दुकानन पर नवका-नवका सेठ बइठत बाड़ें सो। पुरनका शायद रिटायर हो गइलें सो। लाला पुरनका सेठन से ढे़र पटरी बइठला के वास्ता देऽ के नवकन से उधार-पाँइच शुरू कऽ देहलन। महीना-दू-महीना के वादा जब बरीस निचकावे लागे तऽ सेठन केपारा चढ़े। – ‘काऽ भइल एऽ मुंशी जी? . . . ढेर वादा खिलाफी होताऽ। . . कुछ नया पुरान हिसाब होत रहेला तऽ ठीक रहेला।’

काने के जरीले मुस्की मारत सुँघनी लाल बड़ा अदब से जवाब देसऽ, – ‘हँऽ बेटा, हमहूँ जानतानी कि पान के पत्ता आ व्यापार के पइसा फेरात रहे तब्बे ठीक हऽ, नाऽ तऽ सड़ला के डर रहेला। . . . बाकीर काऽ करीं होऽ? . . देखऽ ना, लखनऊ में एगो हमार भाई रहेला, ऊऽ कहलस कि घबड़ा मत, दिवाली में हम बीस हजार रूपया लेके आवऽतानी। . . पँइचा-उधार सधाऽ के तहरा खातिर राशन-पताई खरीद देब।’

अब तऽ लाला के एक्के दाव में लइकाइएँ में ठकुराई करतऽ ऊ सेठराम के सब सिट्टी-पिट्टी बंद हो जाव। ऊ दोसरे कल्पना में बिचरे लागें। – ‘चलऽ, एह उधार  देहला के एतना तऽ मुनाफा होई कि बीस हजार के ना तऽ पाँचो-सात हजार के सामान लाला हमरा दुकान से ले जइहें।’

सुँघनी लाल आइसही अजीब-अजीब के चमक देखाऽ के अउरीओ उधार के सुतार बइठा लेलन। जवन सेठ लोग सामान निकलला में तनिको देर करें तऽ लाला गरमइबों करेंऽ, – ‘काहो मर्दवा, . . काहें देर होताऽ? . . . सामान देबे के मन नइखे करत तऽ छोड़ऽ। साफ-साफ कहि दऽ। हमरा खातिर ढेर दुकान बाऽ। उधारे न लेतानीऽ, आ जनात काल्ह दिअइबे करी। . . . कवनो खैरात थोड़े माँगऽ तानीऽ।’

सुँघनी लाल के एह अचूक प्रहार से दुकानदार राम के बहाना बनवला के अलावा अउरी कवनो दावे ना मिलेला। आपन दाँत चिआरत कहे लागेला लोग, – ‘ना चाचा! . . हम दोसर कुछ सोंचे लगनी हँऽ।’

‘बेटी जवान हो गइल। लइका पढ़के घरे आ गइल ।एक्को पाई लगे ना। कहाँ से काऽ होई? . . . कबले दुकानदारन से आइस-पाइस खेलल जाई? . . चाहें छोड़ऽ। का चिंता करे के बाऽ? . . जेतरे निबहऽता, ओही तरे निबहीऽ। जे सिरजले बाऽ, ऊहे पाली-पोसी। नाक पारठों कला से लकीर बदली आना दुखड़ा रोअला से बिपत बही। जवने तरे चलऽता, कुछ दिन अउरी चलेऽ। आगे सोंचल जाईऽ। . . . सबदिन अन्हारे ना नु रहीऽ। कबो तऽ बादर बिलाई आ किरीन फूटीऽ। ईहो तऽ एगो कलाकारिए न हऽ। एह बनीयन से उधार लेबे के सबके ढंग थोड़े न बाऽ। . . . आम, नीबू, बनीया . . . चाँपे तऽ रस देसुऽ। . . बस एक्के गो चिन्ता बा कि ऊ हमार पुतवा ना जाने, नाहीं तऽ नवका दुनिया के ऊ नवही, उल्टे हमरे के बाउर बुझे लागी। ऊ काऽ समझताऽ कि एड़ी के पसेना मुड़ी पर चढ़ाऽ के आ नस-नस के साहस बटोर के झूठ बोले के पड़ेलाऽ। ओह तरे के कला दइब सबके थोड़े देलन। बाभन कुल में जनमल  रहीतीं तब काऽ? तब तऽ दूनो हाथ में लड्डूए रहित। पहिले के जमाना में एक मुठी चिउड़ा पर अन्हरिया रात में दउड़े वाला आधरती के देवता कहाए वाला ऊ जीव कबआपन खाला? जानकर आटा, आनकर घी, चाभऽ-चाभऽ बाबाजी।’ – इहे सब सोंचते सोंचत लाला के बुझइबे ना कइल कि कब सरोज एक गिलास पानी आ झोला दे गइली। ऊ तऽ सोंचला के दुनिया तब पराइल कि जब सुरुज आके कहले, – ‘बाबुजी, . . आज से हम बाजारे जाएब।’

बेटा के ई बात सुनऽ के सुँघनी लाल के तऽ साँप सूँघ लेहलस। भकुआ गइले। काऽ कहें? बात टाले खातिर गिलास के पानी गटई में गटकावत कहलन, – ‘तूँ का खरीदबऽ? . . . अभीन शहर से नया-नया घरे आइल बाड़ऽ, अभी न भाव-ताव समझऽ।बाजार में ठगाऽ जइबऽ।’

अपना पहीलका सिद्धान्त-युद्ध में बेटा से जीत के सुँघनी लाल अइठत बाजार के डगर धऽ लिहलन। बाजारे तऽ गइलन, बाकीर आज गिलास के पनीयो ना जतरा बनवलस। शायद अब असलीयत से सामना करे के बेरा आ गइल रहे।आज तीन-चार दुकान में गइलन।कहीं दाल ना गललऽ। सबसे एक्के बात सुने के मिलल, – ‘जबले पहीलका ना मिली, अब अउरी एक्को चिटुकी उधार ना मिली।’

मुँह लटकवले घरे आ गइले तऽ पहिलका भेंट सूरुजे से भइल। चवन्नी मुस्की वाला अपना बाबुजी के चेहरा पर बारह बजत देखलन तऽ ऊ डेरा गइलन। पूछलन, – ‘का भइल बाबुजी! . . . समनवा कहाँ बा?’

जब सुँघनी खाली हाथ बाजार से घर के राह पकड़ते, तब खाली इहे सोंचतअइले कि जवाब का देबऽ? ऊ जानत रहले कि सभे चुप रही बाकीर ई सुरुजवा ना मानी, जरूर पूछी, से सहीए भइल। कहलें, – ‘पता ना कवना के मुँह देखके गइनी हँऽ कि जतरा पर पानी फेराऽ गइलहऽ। . . . शायद चेंट से सुरती निकालत में कहीं पइसवे गिर गइल हऽ।’

अपने बाप के चोखा मुँह देख के सुरुज सहीए बुझ गइले। आ ऊ एक बेर फिर से अपने जनमल बेटा के हराऽ दिहलें। उनके चेहरा पर एह बात के गर्व झलके लागल। . ..ओह दिन बिना तेल-तासने के तरकारी रिन्हाइल। सुरुज फेरा में पड़ गइलन कि एही घर से हमरा खातिर डिब्बा के डिब्बा घीव जात रहल हऽ आ अब तेलो खातिर तरसे के पड़ताऽ। उनका पढ़ल-लिखल कपार में भी ई ना समाइल कि बाप-महतारी कवन-कवन अधापन कऽ के बेटा-बेटी के पढ़ावेला। अरे, माई-बाप तऽ अपने एक चिटुकी नमक चाट के पानी पीलीऽ बाकीर संतानन खातिर सिरनीए-मलीदा चाही। वाह रे माई-बाप अइसन जीव! सहीए बात बुझाला कि एतना पाप बढ़ला के बादो धरती माई-बाप जइसन जीवे के कारण धीरज धइले बाड़ीऽ, ना तऽ कब्बे पलट गइल रहती। सुँघनीयो लाल एगो बापे न रहलें। ऊ काऽ बतावें कि कपार पर करजा एतना हो गइल बा कि बोझ के डोज़ से कब फाट जावऽ, कवनो ठेकान नइखे।

दूसरको दिने जब खालीए वापस आ गइलें तऽ लाला दुकान ना खुलला के बहाना बनवलें। कहलें कि हड़ताल बाऽ। ई सुनके सुरुज कुछ देर सोंचे लगले कि ई शहर के बेमारी हड़ताल एह गाँवों में आ गइल । वाह रे प्रगति। बाकीर तीसरका दिने सुँघनी लाल का कहें? . ..कुछ-कुछ सच्चाई के लगे जाहीं के पड़ल। बाकीर ओहू सच्चाई के बेचारू मान बचावे खातिर झूठे केचादर में लपेटले रहले। कहले, – ‘पइसा तऽ बा नाऽ, से उधार लेबे के हिम्मत ना भइल हऽ।आज ले मुँह नइखीं खोलले, तऽ का खोलीं। कहीं जबान खाली चल गइल तऽ इज्जत गाछे टँगा जाई।’

सुँघनी लाल के पता ना कवन मजा आवे कि ऊ अपना घर के आ आपन सच्चाई सबसे छुपवलें रहें। बेटा तऽ उनकर जामल हऽ।ऊहे तऽ उनके मूल धन हऽ।ओह से का पर्दा? . . . बेटी तऽ इज्जत हऽ। ओहके ओढनी से खालीओ केतने ना ढँकाला, माई-बाप के इज्जतो ढँकाला। बाप के नाक ऊँच करे खातिर कुल-मरजाद आ रहन के निर्वाह करत सरोज से तऽ कुछ छुपावे वाला रहबे ना कइल, बाक़िर सुँघनी लाल के ना जाने काऽ मजा आवेला। आ जीतन! . . . ऊ तऽ मेहरारू ना, छछात देवी हई। और सब तऽ दूर फेंकी, सबसे बढ़के तऽ ऊ इनकर पत्नी हई। पति-पत्नी के रिश्ता से समर्पित अउर कवन रिश्ता हो सकेला? . . जब दू देश के दू गो चिरई, अग्नि के साक्षी मान के साथे जीए-मुए के कीरीया खाके तन आ मन में बस जालें तऽ ओही के तऽ पति-पत्नी कहल जाला। बाकीर लाला तऽ ओह जीतनो से कुछ ना बतावेलन।

अब बेटा पढ़के घरे आ गइल, जइसे उनके पोल खुलला के बेरा आ गइल। बाप के ओह बात पर सुरुज कहलें, – ‘सिंहासन काका के गुड्डुआ दुकाने पर नऽ बइठेला, ऊऽ तऽ हमार ईयार हऽ। दऽ हम ओकरा से उधार ले आईं।’

लाला तऽ अन्हरीआए लगले। अब ना बनल, तब बनल। मामला बिगड़ेना, से कहलें, – ‘तूँ का जइबऽ। तहार इयार हऽ तऽ का हऽ, दुकानदार केहू के ना होलें बाबू। . . ऊ तहरो के ठग दी। . . हमहीं बिहान जाएब। एह बेरा केहू तरे डगरे दऽ। परान हार गइल बाऽ।’

सुरुज तऽ चुप हो गइलें बाकीर बाप बेटा से कुछ छिपा रहल बाड़े, ई बेटा पढ़ लिहलस। जेठ अपना जवानी पर रहल। पछीम के किरिन मलुआत रहे। साँझ के चिन्हा चारूओर लउकत रहे। गाछ-वृक्ष धुर्रा से भरल रहे। चिरई-चुरूंग चेंव-घेंव कऽ के आपन-आपन घर खोजत रहलें सों। सुँघनी लाल डोल-डाल गइलें तऽ सुरुज बाजारे चल दिहलें। गुड्डू अपना दुकान पर बइठल रहले। सुरुज के देखले तऽ अँकवार में भर लेहले। सुरुज के हाथ पकड़ले अपना नियरा बइठवले आ लगले हाथ पूछियो लेहले, – ‘का होता सुरुज ?’

‘बी. एस सी. के परीक्षा देके अभीन तऽ घरहीं बानी।’

एगो लमहर साँस छोड़ते गुड्डू कहलन, – ‘अब कुछ करऽ कि काका के कष्ट पराय।बड़ा परेशान बाड़न। . . आच्छा, ई बतावऽ कि तहार हऊ चाचा कबलेअ इहें?’

‘कवन चाचा?’ – सुरुज भकुअइले।

‘तहरा बाबुजी के मामा के साली के लइका केहू बानऽ, जे काका के ढेर मानेला? . . जे उनकर सब करजा भरे के कहले बाऽ?’

‘नातऽ। . . . कइसन चाचा आ कइसन करजा गुड्डू?’

एक बेर तऽ गुड्डुआ बउआगइल। ओकरा बुझाइल कि सूरुजा के तऽ मजाक कइला के पुरान आदत हऽ, बाकीर जब बेर-बेर ऊ एक्के बात रटेंऽ तऽ लागल की बात सही बाऽ।सुरुज आगे कहले, – ‘तहनी के केऽ तरे विश्वास क लिहल लोगीन इयार? . . आरे मर्दवा, आज केजुग में आपन भाई तऽ एगो रोटी देबेके बेरा दस बेर सोंचऽता, तऽ ऊ तेल-तासन वाला भाई का करीहें होऽ?’

‘ठीक कहऽ तारऽ, बाकीर हमहीं भर ना, बाजार के सगरी दुकानदार ई सोंच के उधार देत रहलें कि लाला लोग ढेर रिश्ता निभावेला लोग।ऊ लोग दिन भर में जेतना साँस लेला लोग, ओतने रिश्ता निभावेला लोग। . . रिश्ता केऽ तरे बनेला आऽ केऽ तरे निबहेला, ई केहू तहनी से सीखे।’

‘तऽ काऽ आज ले बाबुजी के गृहस्ती करजे से चलत रहल हऽ का?’

‘तबका ईयार! . . . एक हप्ता पहीले काका कहले कि सुरुज आइल बाड़े, भाई के खबर आइल बा। आज अइहें, बिहान अइहें। ई खेल जब बरदास के बाहर होखे लागल तऽ सभे सामान दिहल बन्द कऽ दिहल।’

अपना बाबुजी के ई छली रूप देख के सुरुज के बुझइबे ना करे कि काऽ करें। मन करे कि एक पसर मुसमरवा फाँक के निश्चिंत हो जाईं। जब गुड्डू दुकानदारन के गिनवलन तऽ पता लागल कि सुँघनी लाल लाखन के करजदार बाड़न। सुरुज के मन कोठा-कोठा नाचे लागल । एकबेर तऽ मन कइलस कि एह छली रूप रखे वाला बाप के गटई में गमछी कसके मुआदीं, बाकीर खीस के एही अँगना में एगो आदर भरल पेड़ जामे लागल, जवना के गर्व कहल जा सकल जाला। ऊ सोंचे लगलन, – ‘बड़ा जीवट बाप बाड़न ईऽ। गृहस्ती चलावे खातिर कर्जा के परवाह कइले बिना आज के जुग में निमन-चिकन खिआ के बी. एस सी. पढ़ा लिहल कम ना होला। दुनिया के सगरी बाप अइसहीं होलन का कि कर्जा में डुबीयो के संतानन के सुख के ललसा मन में धइले रहेलन?’

सुरुज सोच के ओह गाँव में चल गइलन, जहवाँ लागल कि उनकर बाबुजी एतना बिपत एही से न उठवलन कि बेटा पढ़के नौकरी पइबे करी। आ बेटा निकलल आज के पढ़वइया ।जहाँ नोकरी के सपनो देखल दुस्वार बाऽ। सुरुज के चेहरा के भंगिमा लागल बतावे कि ऊ कुछ प्रतिज्ञा करत बाड़े। पलट के गुड्डू से सट गइलन, – ‘गुड्डू हो। . . . हम एह कर्जा के उतारेब। बाबुजी घर चलावे खातिर कर्जा लिहलन तऽ हम उनके कर्जा उतारे खातिर मेहनत करेब। . . . बस, आज के बाद हमरा घरे उधार ना जाई। आज भर हमार बात मानलऽ। आज हमके सामान आ कुछ रूपया देदऽ।’

गुड्डू बड़ा निहोरा पर उनके बात मान गइलन। सुरुज सामान लेके घरे अइलन तऽ उनके बाबुजी बेचैन हो गइलन। पूछलें, – ‘कहाँ से सामान आइल हऽ हो?’

‘गुड्डू के दुकान से।’

‘कुछ कहतोऽ रहल हऽ का?’

‘का बाबुजी?’

‘माने बड़ा नीक लइका हऽ। गइला पर बिना चाय पिअवले ना आवे देला।’

‘हँऽ। . . . कहत रहल हऽ कि काका कहाँ बाड़े? . . ढेर दिन देखले भइल।’

दूनो जने अपना-अपना बात के चोरी पर मुस्कुराए लगलें। रतहीया राज बढ़े लागल। रात के करीका रूप चारू ओर बइठल रहे। पसीना चुआवत जेठ के संझा के हवा में तनी गुदगुदहवा ठंडा रहल। आकाश में चनरमा हँसुली के सकल लेके रात रानी के गरदन में चमकत रहलन। उनका आगे-पीछे जोन्हीयो झोहल रहली सों। गाछ पर भकजोन्ही अपना छली रूप पर घमण्डे डुबत-उतरात रहली सों।बरला पर तऽ चनरमों के कुछ ना बुझे सों, बाकीर बुतइला पर अस्तित्वे खतम हो जाए। ओकनी के भरमावे वाला क्षण भर के अँजोर के रात के अन्हरीया लील ले।

सुँघनी लाल कुरसी पर बइठल रहलन। सुरुज खटिया पर छितराइल रहले। बाप अपना पूत में चनरमा के जोत देखत रहलें तऽ बेटा गाछी पर भजोन्हीन के बरत-बुताइल, आ ओहसे तुलना कऽ के अपने बाबबुजी के देखत रहलें। सुरुज खातिर दूनो में कवनो ढेर अंतर ना रहे। दूनो अपना-अपना अस्तित्व खातिर दुनिया के धोखा देबे में माहीर बाड़ें। ओने बाजार में गुड्डू से होते, मुँहे-मुँह सगरी दुकानदार लाला के असलीयत जान गइलन। सभे एक्के सुर में पीटे के पलान बनवलन । गुड्डू एगो असली मीतकेधरमनिभवले।कहले, – ‘पीटलासेपइसामिलजाईका?’

नकछेद काका खाँसत कहलन, – ‘चलके थाना में चार सौ बीसी के पिटीसन दे दिहल जाव।’ . . . .

आज के बिहान तनी दोसरे ढंग के भइल बा। दिनकर के ललका अँजोर में पीड़ा के पीअरी धइले बा। बेआर में एगो दम्मी सधले डरके कँपकपी बा। चिरई जइसे बिलखत बाड़ी सों। जइसे शिवालय से घंटा-घड़ीयाल के स्वरे नइखे फूटत। जइसे आज केबिहान दोसरा जुग के बिहान हऽ। कुफुत के बिहान हऽ। बिपत के बिहान हऽ।

सुरुज भिनसरहीं एगो जरूरी काम बता के शहर चल गऊवन। सँऊसे दिन के ऽतरे बितल, एकर लेखा-जोखा विधातो ना पवले होइहें। होत तिजहरीया सड़की पर लउकले। ईऽ काऽ? . . . ऊ एगो ठेला पर सतुई के लस्सी बेंचत रहुवन। लस्सी के मटका पर टहकदार रंग में लिखल बा- ‘बिहार के टॉनिक’। . . . एने चार सौ बीसी में सुँघनी लाल के पुलिस जेल ले जात बिआ।ओने अपने बाप के कपार से करजा उतारे खातिर बेटा ठेला रूपी पनछुइया नाव से जिनगी के समुन्दर में आगे बढ़ रहल बाऽ। बेटा के लिलार पर एह बात के गर्व बा तऽ बाप के चेहरा पर पछतावा बाऽ। सुरुज के आँख के सामने उनकर बाबुजी आ अन्हरीया रात के भकजोन्ही बाड़ी सों। दूनो आपन अस्तित्व कायम रखे खातिर अपनहूँ साथे छल करे में माहीर बाड़ें। ना जाने दुनिया में अइसन केतना लोग बा? ना जाने सुरुज जइसन बेटो बाड़े का??

  • केशव मोहन पाण्डेय

(ई कहानी 2002 में लिखाइल रहे आ भोजपुरी कहानी-संग्रह कठकरेज में संकलित बा)

 

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