बिछावे जाल मछेरा रे

बिछावे जाल मछेरा रे
सभके छीने बसेरा रे

कहे हम भाग्य विधाता ह ईं
सभ के जीवन दाता ह ईं
सरग में सभका के पहुँचाइब
हमहीं भारत माता ह ईं
बढ़ावे रोज अंधेरा रे

चकमक चकमक सगरो करे
जोति नयन के चुपके हरे
देखावे सपना रोज नया ई
पेट सँघतियन के ई भरे
भगावे दूर सबेरा रे

कैद में सुरुज अउरी चान
करे के बा ओकर अभियान
बजावे ढोल ढमाका खूब
नाप देलस धरती असमान
उगावे खूब लमेरा रे

करीं का कांटक सोचे रोज
करेलन हथियारन के खोज
बाँची मीन के क इसे जान
मने ना निरद इयन के भोज
लगावे सगरो फेरा रे

* * *
— सुरेश कांटक
कांट, ब्रह्मपुर, बक्सर, बिहार , 802112

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