प्रेम -प्रेम सब कोई कहे ,प्रेम न चीन्हे कोई…..

साहित्य -सरिता क फरवरी अंक “प्रेम -विशेषांक ” ह। ग्यानी -ध्यानी पुरखा -पुरनिया प्रेम के अकथ -अबूझ कहले हउवन।सचहूं, कहाँ केहू गुन-गथ पउलस प्रेम के ? जे एह अबूझ के बूझ लिहलस ऊ परम आनंद में मगन,सुध -बुध बिसरवले मगन मन गावे -नाचे लगल आ दीन -दुनिया से बेखबर ‘चैतन्य ‘ हो गइल,’मीरा’ हो गइल।कबीर ,तुलसी ,रैदास हो गइल।पीर में मातल,नेह में भोरल ‘घनानंद’ हो गइल।केतना -केतना कहाइल, केतना गवाइल, केतना बखानल गइल बाकिर प्रेम क खिस्सा ,कहनी ,गीत,ओतने अजान, ओतने रहस्यमय,ओतने नया, ओतने पुरान आजो ह जेतना सृष्टि के प्रारम्भ में रहल होई जब एके बखाने खातिर कवनों बोली – भाषा ना रहल होई। एह ‘ चिर पुरान,चिर नवीन’ अकथ कहानी क जाने केतना किरदार अइलन आ धरती के रंगमंच पर आपन -आपन भूमिका अदा करके ओही विराट सत्ता में विलीन हो गइलन जवने से जड़ -चेतन स्पन्दित ह,चलायमान ह।ओही विराट सत्ता क लीला धरती -आकाश के कण-कण में विद्यमान ह।’क्षिति जल पावक गगन समीरा’ सबही क स्वतंत्र अस्तित्व ह बाकिर सबके सुमेल से ही सृष्टि सम्भव हे। एह सुमेल से ही प्रेम पलेला ,पोसाला अउर पेड़-पालो,चिरई – चुरुंग में राग-रंग बनके नगर -क़स्बा ,गाँव -गिराँव लहरात-इतरात डोलेला। संसार के कुल बोली -भाषा क इतिहास प्रेम के राग-विराग क लिखित विराट दस्तावेज ह।कवनों पवित्र ग्रन्थ भा कवनों भी कलात्मक सृजन के देख लिहीं ओकरे नींव में प्रेम क व्यवहार, प्रेम क ही पैसार पाइब जा।भोजपुरी संस्कृति के त मूल में ही प्रेमभाव ह,जनम संस्कार से लेके अंतिम संस्कार तक क गीत कवन घर क अँगनइया, कवन टोला – परोसा ना सुनले होई ? गीत-ग़ज़ल क ,खिस्सा -कहनी क वाचिक परम्परा त आदिम काल से,बोली-भाषा के ईज़ाद से ही चलल आवत ह। लिखित प्रेम -परक साहित्य भी भोजपुरी में अथाह ह ,ओही अथाह -थाती के कई गो पत्र -पत्रिका सहेजले-सँचले हईं।भोजपुरी साहित्य-सरिता क भी ई एगो छोटहन प्रयास आपलोगन के सोझा ह।एह प्रयास में अपने मूल थाती के नमन करत वर्तमान समय में प्रेम के कइसे जानल-देखल जात ह, कइसे सिरजल -गुनल जात ह, ओही क झलक-पुलक के संगे भोजपुरी साहित्य-सरिता से नेह-छोह रखे वाला, सराहे- दुलारे वाला आत्मीय -सनेही लोगन के साहित्य -सरिता परिवार क करजोर, प्रणाम ह, आभार ह।

संगही हम ‘साहित्य -सरिता’ के निर्मिति में ,प्राण-प्रतिष्ठा में, जुटल-जूझल, मन-प्राण से समर्पित सदस्य गण- आदरणीय जेपी द्विवेदी जी, केशव मोहन जी, संतोष पटेल जी, डॉ. ऋचा सिंह जी सबही के एह सम्मिलित प्रयास के , परस्पर आदर- नेह के चिरंजीवी होवे क कामना करत हईं आ एह पत्रिका में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभावे वाला आदरणीय -सम्मानित लेखक-गण के प्रति आभार प्रकट करत करजोर निहोरा करत हईं कि एहितरे आपन नेह -छोह बनवले रहब जा और साहित्य-सरिता के अविरल प्रवाह के अक्षुण्ण रखब जा।

राउर आपन….

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