पौधा

कब अब बिहान होई,
खुशी में परान होई।
जउन पौधा लागल बा,
सहिओ जवान होई।।

के पानी दी ,के खाद दी,
के वहके वरदान दी।
चार दिन जियते,
फिर उहे उजाड़ होई ।।

लगाव त लगाव पेड़,
घरे अउर दलान में।
जहां रहे सबकर नजर,
होश और ख्याल में ।।

पानी दिह, खाद दिह,
गोरुओ न चर पाए ।
जउन लागल बा आज ,
काल्हिहो तक बढ़ पाए ।।

बाप-दादा के लगावल पेड़,
कुल हम काट देहली।
लइकन के लगावल पौधा,
उनहू के छांट देहली।।

गलती के सुधार द,
सांस के आधार द,।
सबके व्यवहार द,
पौधा उपहार द।।

डॉ. शशि सिंह

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