नोबेल प्राइज विनर आयरिस कवि सिमस हीनी के कविता के भोजपुरी अनुवाद – खोदाई

हमार अंगूरी आ अंगूठा के बीचे

टिकल बा पुरान लउकत कलम, बंदूक के लेखा चुस्त-दुरुस्त

 

हमार खिड़की के बाहर खनखनात-किरकिरात

इकरी वाला ज़मीन के भीतरी धंसत कोदार के आवाज़

खुदाई कर रहल बाड़ें हमार बाबूजी , हम देखत बानी नीचे

फूल के क्यारी के बीचे उनकर तनाइल पुट्ठा

कबो निहुरत बा नीचे, कबो ऊपर उठत बा

उ खेत कोड़त ताल मिलावत झुकत-तनत

चल गइल बीस बरस पाहिले हमार मन

ज़हवाँ उहाँ के आलू के खुदाई करत रहनी

कोदार के बेंट धइले मजबूत हाथ से

आलू के मेंड पर मारत जोरदार गहिरा दाब

धंसावत ज़मीन में आ उकसकावत बेंट के आगे धकिया के

त ताज़ा माटी से सनाइल आलू छितरा जात रहे

जेकरा चुन चुन के हम महसूस करत रहीं

उनकर कठिन परिश्रम आपन ननकी चुकी तरहत्थी  पर.

 

हे भगवान, इ बूढ आदमी त हमार बपसी लेखे

भांजत बा कुदाल.

 

हमार बाबा कोंड़ सकत रहले दिन भर में टोनर के दलदल में

दोसर केहू अदमी से जादे खेत.

एक बार हम उनका ला ले गइनी एक बोतल दूध

कागज़ के ढीला डाट लगा के . खोल के पी गइले गटागट

फेर सीधे जुट गइले आ तरीका से खींचलें डोल

आ क्यारी बनवले , हाँफत हांफत हौले हौले से

खोद-खोद के बना दिहले सुन्दर खेत.

 

आलू के खेत के ठंडा खुशबू, पौधा के नीचे हौले हौले थपकी

निराई में निकलल भींजल कुश, मेड के छिलाई से उभर आइल

माटी से झांकत ताज़ा कटल जड़ के इयाद आ गइल हमरा

बाकिर हमरा लगे कुदाल नइखे कि हमहूँ अनुसरण करीं

ओही लोगन के .

 

हमार अंगूरी आ अंगूठी के बीचे

टिकल बा पुरान लउकत कलम,

एही से खोदाई करब हम .

खोदाई

( भोजपुरी अनुवाद – संतोष पटेल)

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