धन-कटनी

*[01]*
खेतवा की आरी आरी,सुनरी सुग्घरि नारी,
पीयरि पहिरी सारी,छमके छमकि छमक।
हँसुआ से काटि धान,गावेली मधुर गान,
कर के कंगन दूनो,खनके खनकि खनक।।
*[02]*
लामे लामे पारि धरे लामे पलिहारि धरे,
गुर्ही करे बोझा बान्हे,धनिया चमकि चमक।
पुरुआ बयार बहे,रूपगर नार लागे,
गते से गुजर जाये,रहिया छनकि छनक।।
*[03]*
पिया खरिहानी करी,आँटी अरु बोझाबारी,
सभके ही सोझाकरी,किनारी अंकवारि धरि।
चानीझरी रानीझरी,नारी रतनारी झरी,
हीरा पन्ना मोतीझरी, सोनाचूर बखारि भरि।।
*[04]*
चूरा चाउर बनेला,खीर जाउर चढ़ेला,
जन गन मन सभ,जीयेलनि हुलसि कर।
बहरी अंजोर करे, भीतरी बिभोर कर
सभ मिली हँसेलनि,बरेलनि उजसि उर।।
*[05]*
सजनी बिचार करे,मन मनुहार करे,
पिया से गोहार करे,माँगतु नथ लटकन।
सजना बाजार करे,जाये ऊ सोनार घरे,
निक से निरेखि करि,किनतु धन सुबरन।।

अमरेन्द्र कुमार सिंह
आरा (भोजपुर) बिहार

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