दरजन भरि भौजाई

दरजन भरि भौजाई हमार हम भौजिन के छोटका देवर
केहू के आँखी के फुल्ली केहूके काने के जेवर
केहू के जिया लुआठी अस हमरी बोली पर जरि जाये
कवनो भौजी के दूनो अँखियाँ हमें देखते भरि जाये
सासूजी के पेटपोछना कहि के केहू जिउ हल्लुक क ले
जब कोहना जां छोटकी भौजी दोकाहें हमरा बड़ खले
नखरा-तिल्ला भैया खातिर हमरे हिस्से गुस्सा-तेवर
दरजन भरि………….
एक दिन कहली नवकी भौजी दुपहरिया में खाये आईं
ओही लगले डकखाना से भैय्या के चिट्ठी ले आईं
आ भैओ एक लिफाफा में दुकेतना पन्ना भरेलें
रोजे त चिट्ठी लीखेलें ऊ कवन नोकरी करेलें
चिट्ठी पा भौजी का होजां ऊ मूरति हम कैसे गढ़ीं
ऊ थाहि थाहि पाती पढ़ें आ हम उनके मुहवां पढ़ीं
कबहूं ऊषा के लाली दूनो गालन पर उतरे सगरी
कबहूं आँखिन में ठहरि जाय सावन भादों के घन बदरी
कबहूं तनि माथ झुका के नहे से धरती खोने लागें
चिठिया के अँचरा में लपेटि आउंज गांउज बोले गावें
हमरे अनुपस्थिति के रेकार्ड इसकूले में भागे लागल
भौजी के पोस्टमैन कहि के साथी सभे दागे लागल
दरजा में रोज़ खड़ा होलीं बेन्चे पर भौजी से कहलीं
हमरे खातिर इहो न सहब कइसनका देवर हयीं जी
रउरे खातिर अपने हाथे छननी हँ देसी में घेवर
दरजन भरि……………
मझली भौजी के छोट बहिन हमरे घरे अइली एक दिन
हमरा मनमस्त सँपेरा के जैसे भेटली कवनो नागिन
उनकर अगुआनी में हमार बीते लागल
जिनगी पल-छिन
उनसे कहि के पढ़े जाईं,उनके लगे पढ़ि के आईं
उनहूं के मनवा में रहे हम एन्ने ओन्ने ना जाईं
उनके लगे हमरो नीक लागे, काँहे लागे बुझिना पाईं
पल में बीतल किछु मास, एक दिन आ गैलन उनकर भैया
चउका पर बैठल रहे सभे,तबले छेड़लें आपन चर्चा
छोटकू बाबू से क देईं बबुनिया के रिश्ता पक्का
हमरा लागल केतना खालीं बाकी सबके लागल धक्का
केहू सुनि के गंभीर भईल,केहू दांते से नह कुतरे
केहू के मूहें के अनाज गटई के नीचे ना उतरे
भैया सोचें भाई-साढ़ू से डाँड़ी ना मारल बनी
बापू सोचें समधी पुरान के हिक भरि ना गारल बनी
भौजी सोचें कि छोट बहिनियां बनि जाई जब देवरानी
तब का जानी हमके आपन दिदिया मानी कि ना मानी
हमरे ओ प्रेम घरौंधा पर फेरल सब मिल के बुलडोजर….
दरजन भरि भौजाई हमार…………..
उनके भैया सोचें रिश्ता पुरान सस्ते में पटि जाई
घर-घर जा के वर खोजला के झंझटि ऊपर से कटि जाई
ए सबके सोचवा सोचि-सोचि,माई के सोच हम ‘फील’ करीं
त हम सोचलीं कि ए तनाव के अब हमहीं किछु ढील करीं
जबले पूरा पढ़ि-लिखि के ठाढ़ न अपने गोड़े पर होखब
भीषम प्रतिग्यां ह हमार तबले बिआह के ना सोचब
किछु जीऊ कड़ा कइके तुरंत ओ सबके सोच मेटा देहलीं
दुनिया के प्रेम शहीदन में हम आपन नाव लिखा लेहलीं
ई सुनि के सब सलहन्त भइल,उनका काटे लागल ई घर
हमहूँ इसकूले चलि देहलीं धs छाती पर भारी पत्थर…
दरजन भरि भौजाई हमार………..
–आर डी एन श्रीवास्तव,
जी – 3/22,रेल विहार,
फ़ेज 2,चरगांवां, गोरखपुर-273013.
मो० 9451518470,
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