जय गंगा माई

आगे आगे चलैं भगीरथ, पीछे गंगा माई
अब केहू ना रही पियासल,सबही अब तर जाई
केतना मान मनउअल कइली कइली घोर तपस्या
तब जा के मनली हौ गंगा, करिहै दूर समस्या
बड़े वेग से देव लोक से,चलनी होत बिहाने
अपने धुन मे पर्वत पर्वत उछड़ै बड़े गुमाने
नागिन अस डोलै फुफकारै,चलैं बनावत रस्ता
जंगल पर्वत ऊसर बंजर सबसे हौ बाबस्ता
सीचैं खेत कियारी गंगा,धरती के हुलसावैं
जेहर जेहर होके निकलैं ओहरै नगर बसावैं
जनम मरण से मोक्ष दियावैं, सबै पियावैं पानी
ना पूछैं ई जात पात ना पूछैं बोली बानी
केतनन कै ई पाप नसौनी केतनन के ई तरलीं
प्रेम से जब रैदास सुमिरलैं, कठवत बीच समइलीं
कहा भगीरथि,देवपगा या सुरसरि इन्हैं पुकारा
सबही कै तासीर एक हौ ,सबकर निर्मल धारा
काशी ,हरिद्वार जा चाहे,तूं प्रयाग में देखा
आपन आपन पाप धोय सब कै देहलस अनदेखा
देख के गंगा कै ई हालत, फटल जात हौ छाती
छ:छ: पात बहावैं गंगा, रोवैं दिन औ राती
केकरे ऊपर दोस मढ़ी हम ,केकर करी दुहाई
का रहली हम का हो गईली सोचैं गंगा माई ।।
  • सरोज त्यागी
गाजियाबाद

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