घरवा में बाटे न हरदिया, दरदिया……!!

का जमाना आ गयो भाया, मारे बरियरा रोवै न देस।  ई त लमहर आफत आइल बाटे भाई, पहिले लोग कड़ी निंदा से काम चला लेत रहलें,बाकि अचके में सुभाव काहें बदल लीहलें? शाकाहारी होखला का बादो हतना तेज झपट्टा, अचके में  बिसवास नइखे होत। अजबे हालत कर दीहलें यार, न कहते बनता आ न  सुनते | एह बेरी त बेसी थू – थू करा दीहल लोग सगरी दुनिया में। अब त रोवहूँ नइखे देत सन, अबले जेकरा आगु रो-गा के भीख मिल जात रहल ह, उ चीन्हलो से मना कर दीहलस। ओपर से सभे के संगे खाड़ होके थपरी पीट रहल बा| एदी पारी सासू जी उपलो नइखी देत, अब रवे सब बताईं लोर कइसे पोछाई। सबका दुअरे जा-जा के टेसुआ बहा चुकनी, झूठ-साँच कुल्हि बोल चुकनी,केहु माने के तइयारे नइखे होत। अब का कहीं लोगन से कि हमरा घर में घुसके लंगटे कर गइलें? आउर त आउर हर बेर लमहर-लमहर तकरीर करे वाला लोगवो पाता ना कवने बिल में घुसल बा लोग? देवार से मुड़ी फोरे का मन हो रहल बा। बाक़िर इहो करल मोसकिल बुझाता। अब त ई आउर बोलता लोग कि इहो घरवा ओनही के बा, हमनी के नइखे। अब त आपन घरवो बचावल भारी पड़ता। बड़ी आफत आइल बाटे, ढोकला आउर फाफड़ा वाला त ढोल बजा दीहलस | हमार हाल त मति पुंछी सभे, कीरा आउर छुछुन्नर लेखा हो गइल बाटे। बुझइते नइखी कि अब का करीं, आ कहवाँ जाईं। ऊपर से लट्ठ लेके छाती ठोंक रहल हौ,उहो 56 इंची वाली|

हद हो गइल भाई, एक मिला त कोमा में भेंज देहलस। केकरा से कहीं “जेकरे पाँव ना फटल बेवाई,से का जाने पीर पराई”। सर्जरी का बाद के दरद त उहे बूझ सकता, जेकर भइल होखे।  कुछ लोग त तीर पर तीर  चला रहल बा। कतों मुँह छुपावे के जगहों नइखे बाचल। जे आज ले बाबू बनि के डोलत रहल ह, उहो चीन्हे से मना करता। अब केकरा से आपन दुखड़ा रोईं, कि मुँह दिखावे जोग नइखी बाचल। हिन्दोस्तान में त कवियनो के पांख उगी आइल बाटे, सभे लमहर-लमहर छोड़ रहल बाड़ें सन। कतना त रावलपिंडी आ कतना इस्लामाबाद में तिरंगा फहरावे के बात कर रहल हउवन स। आ हमरे इहाँ के शायर लवंग खाके गला ठीक करे में लागल बाड़ें। एहनियों के बोलती बन्न हो गइल बाटे। कुछन के तारु चटक रहल बाटे।अब अकेलहीं कतना कसमीर राग गाईं, केहु सुनहूँ वाला नइखे बाचल। जिनगी भर बैट-बल्ला भजली, अब थोथी तकरीर कतना फेंकी। बबवा छक्का पर छक्का मार रहल बाटे। हमरा से त कैचवो नइखी पकड़ात। इमरान चचा के रो रो के आँखियो सूज गइल, गरवो बइठ गइल, बाक़िर बबवा त मुस्की काटता।

बबवा के घरे कुल्हि बच्चा-बुतुरु पेंड़ा बाँट रहल बाड़ें शहर-दर-शहर घूम-घूम के। अब त इहवों ७२ वाली बाति पर कवनों तइयार नइखीं होत सन। कतना बिरियानी आ मुरुगा खिया-खिया के पलले रहनी ह, आधा ले ढेर त तुनक के भाग गइले सन। उहो कुल्हि कंगाली में आटा गील कके भाग लीहने सन। बबवा के अइसन डर फइलल बाटे कि बाजवा के भीतरी बाजा के आवाज आ रहल बाटे। कतने बरीस के हमदर्द लोग त अब फोनवो नइखे उठावत। ई त उहे बात भइल न– “ एक्के के ढंग से मारा, 100 मिला कंपिहन,1000 गो अपनही सुधर जइहन”।

अड़ोसियो-पड़ोसी अब सुने के तइयार नइखी होत।कुछ त संसद में बिल ले के आ रहल बाड़ें, कुछ ले के आइयो गइलें, पता का कर के मानी लोग। गदहा तक बेचा गइल, इहवाँ रोटी के आफत मुड़े पड़ल बाटे। जवना बाति के हमनी बच्चा कलास के लेख बूझत रहनी ह सन,उ त दुरबासा के सराप बनि गइल। जवन कुछ बोलत बाड़े सन, उहे करतो बाड़े सन। सभे लोग आपन-आपन देखे में लागल बा, कुछ लोग बजार छूटे के डरे सोझा नइखे आवत। कुछ लोग मार के डरे बिल में लुका गइल बाटे। अबहिन ले जे दादा बनत फिरत रहल ह, ओकरो घिघ्घी बन्हा गइल बुझाता। अब का भइल? रेंगे वाला सूंघ लेहलस भा नानी मू गइली। जेकरा पर पड़ेला, ओकरे बुझाला। देखs भला, सभे बगली से निकल गइल। अब हम केने जाईं, हमरे ला त समने कुइयाँ आ पाछे खाईं बाटे। लड़ब त बबवा मारी आ ना लड़ब त बाजवा रसरी से बान्ह के लटका देही। ई मोटा भइयवा बड़ आफत में झोंक देहलस। बबवा जवन कसमीर में क दीहलस, ओकरा के न मानते बनता, न छोड़ते बनता। एने बाजवा त बिलार लेखा तखत पर आँखि गड़वले बइठल बाटे। कब मोक़ा भेंटाय आ कब फेविकोल लगा के कुरसी से चिपक लेही। इहवाँ त आपन गरवो साथ नइखे देत, चोक हो गइल बाटे, अवाजे निकले के तइयार नइखी। संगही हर ओरी से  दुलत्ती के सौगात आउर उहो मुफुत में। कहाँ त हम सोचत रहनी ह कि अबरी हैदराबाद के बिरियानी चाप के  आएम, बबवा त सादा पनियो बन्न करे के बाति कर रहल बाटे। ढोकला वाला बबवा कहत फिरत बाटे कि – खून आउर पानी एक संगे नाही बह सकत।हमरा त सपना आवता कि अबरी पी ओ के बेगर लीहले ना चुप बइठी लोग। कुछ मिला त हर पनरहियेँ सर्जरी करे के कह रहल बाड़ें सन।

इहवाँ अपना घर में जेकरा के देखी उहे आपन डफली बजा रहल बाटे आउर अपने खटराग गा रहल बाटे। इहवाँ त रक्षा मंत्री परमाणु हमला आउर मियाँ हाफिज बबवा पर सर्जिकल हमला के पाठ पढ़ा-पढ़ा के हमार मोसकिल बढ़ा रहल बाड़ें। वन से बबवा कहता– “अब कइसे बबुआ नमाज पढ़े जइहें”। हम त नरभषा गइल बानी  इंसा अल्ला। बाउंसर फेंकल भुला गइल, मुँह पर फेफरी पड़ल बाटे। बबवा दुनियाँ भर में घूम-घूम के दाल-रोटी के दुआरी बन्न करावे में लागल बाटे। बबवा के सभे माला-फूल चढ़ा रहल बाटे, यू एन में  जवन किरकिरी भइल, तवन अलगे बाटे,हम मिमियाते रह गइनी। अब त इहे लागता कि भजन गा के काम चलावे के परी-

घरवा में बाटे न हरदिया, दरदिया दीहलस रे बबवा” !!|

 

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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