गवना क दिन निगिचइलें—

का जमाना आ गयो भाया, जवना महिना में लइका त लइका, जवान आ बूढ़-पुरनियाँ सभे होरियाइल होखे,मस्ती में अगराइल होखे,बेगर जोगाड़ वाला डहक रहल होखे आ जोगाड़ वाला लो चहक रहल होखे,ओह घरी कवनो लइकिनी के गवना क दिन धरा जाव, त बूझि कि का-का नाही हो सकेला। इहो सोची कि ऊ जजमान आ पुरोहित के एकरा पाछे का सोच रहल होखी? काहें एही महिना के तजबीजल गइल, कवनो आउर महिना काहे न रखाइल? कुछ लोग इहो कह सकेला कि लगन भा साइत न रहल होखी। अरे भाई असों के बरीस साइते-साइत ह। कवनो भदरा-सदरा के चक्करो ना रहल, तबो इहे महिना काहें? मनराखन पांड़े के कुकुरा के साजिस के गंध आ रहल बा। मनराखन पाड़ें अपने चेला-चपाटन के संगे ज़ोर-शोर से लागल बाड़ें बाकि उनुकर अवाज केहुवो के नइखे सुनात। बेचारी लइकिनिया गवने जाये के तइयारे नइखे होत। अब इहो एगो लमहर शोध के विषय बन चुकल बा। शोध करे खाति आ अक्सरुवा विद्वान लोग बिमर्ष खाति बोला लीहल गइल बाड़न। उहो लो अवते अपना-अपना काम में लाग गइल बाड़न। मुँह में माइक घुसेरे वाला लो अपना काम में जीव-जाँगर के संगे लागल बा। एगो कोठरी में बइठ के कुछ डिजाइनर लो कुछ डिजाइनों करे में लागल बा। मने लमहर-लमहर साँस भरि के सभे सूँघे में लागल बा, बाकि अबले केहुके कुछहु भेंटाइल नइखे।

के-के, के-के  आ का-का भेंटाई, एकर पता त बाद में लागी। एह घरी त सब इहे कहता कि हमरे के सभेले बेसी भेंटाई। जजमान अपना जान के,पुरोहित जी अपना दछिना के आ लगुआ-भगुआ अपने परसादी खाति परयास में लागल बाड़ें। सभे भंडार पर एकमुस्त काबिज होखल चाहत बा। अचके एगो माइक घुसेरू से पुरोहित जी भेंटा गइलें,अब त अन्हरा के का चाही, दुगो  आँखे नु। फेर न आव देखलस न ताव, माइक घुसड़ते पूछ बइठल कि गवना के दिन फागुन में काहें ? पुरोहित बाबा के भोरही उनुकर मलिकाइन खूबे बकोटले रहनी, रउवो त जनते बानी कि उहाँ का आगु सभे के चोंच बन्न हो जाला। पुरोहित बाबा के बोले के मोका भेंटा गइल, करे बुड़बक कवने फागुन के बाति कर रहल बाड़े, जहाँ रंग खेले के मनाही बा, काहें से कि पानी ख़रच हो जाई। कतों तोरा के होरी गवात सुनाइल होखे, त बताव। कतों अबीर-गुलाल उधियात देखले बाड़े, त बताव। जब कहीं अइसन कुछ होते नइखे त कवना बाति के फागुन। एक्का-दुक्का गोल-गोलबंदी वाला लो होली मिलन-सिलन करावतो रहल ह, त ओकरा के सरकार कोरोना के नाँव पर बधिया देहलस। ई ससुर के नाती कोरोनवा उहवाँ ना जाला जहवाँ चुनाव-सुनाव होला। एहु ससुरे के फागुन आ होरिये लउकता। फेर अइसना में गवना के दिन धइल बाउर कइसे बा?

सुन बबुआ! गवना त होखबे करी, बिदा केहु होखो चाहे लइका भा लइकी। हमरा के अपना दछिना मिले के चाही आ ऊ मिल रहल बा। तेहूँ  सुन ! अकर-बकर बोले वाला लोगिन के पकड़िके आपन दोकान सजाव, हमार मगज मति चाट। अबे दू गो चैनल क समाचार सुन के आवतानी, भेजा के भेजाफ्राई बनि चुकल बा। बाचल-खुचल पर मलकाइन तड़का मार चुकल बानी। अब तें गोहूँ  के रास पर लेंढ़ा  के बढ़ावन लेखा कपारे मति पड़, आगु बढ़। एगो कोना में ठाढ़ मनराखन पांड़े पुरोहित बाबा आ माइक घुसेरू के बाति सुनत रहलें आ सुन-सुन के मुसकियात रहलें। उनुका संघतिया लो चिहा-चिहा के उनुकर मुँह देख रहल बाड़ें। मुस्कियात त जनतो बा बाकि मनराखन पाड़ें पर। मनराखन पांडे अइसन खेलाड़ी हउवन जे गेना के अपनही गोल में झोंक देला। इनका उपस्थिति से बिरोधियो लो खुस हो जाला। काहें से कि मनराखन पांडे कुछहु अकर-बकर बोलत रहे लन। उनुका अकर-बकर से बिरोधिये लोग ओटने जियादा खुस रहेलन। खुस त अब रउवो के होखे के चाही। काहें से कि मनराखन पांडे के कुछ लोग मनोरंजन पांडे कहेला। मनोरंजन अब रउवो सभे के होखी, मन करे त मुस्किआईं भा ठहाका लगाईं। रउवा सभे अब चाहे फाग गाईं , अब हम चलनी होरी खेले। राउर मन होखे त हमरा संगे गाईं-

होरी क साध मुरझइलें

पिया मोर, असवों न अइलें।

कतनों के  मन फगुनइलें

पिया मोर, असवों न अइलें।

 

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

संपादक

  भोजपुरी साहित्य सरिता

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