कुररे काग भदेस

अब के सगुन कही
मोरी सखिया,
कुररे काग भदेस।

ना अँगनइया गाछि चनन की,
सास-ननद परबीना।
कबके मरल आँखि के पानी
लोक लाज कतहीं ना,
ईरिखे गोतिन जरि न बुताली,
उलटा सब परिवेस।

बनटेसू की छाँहि कटीली
असबस जिया बुझाला।
भुतहा पीपर छाँहि चुरावे,
बरगद उमटा जाला,
बिरिछ-बिरिछ पर बदुरी झूले
उलटपंथ दरवेस।

बिसर रहल गनगौर महादे’
मनता कवन पुजावे।
सबहीं ढेल-ढुकुर महँकारे,
परले पीठ खुजावे,
नदियन के अमरित पानी में,
माहुर केरि अनेस।

खर-खरिहानी दंड मुसरिया
परल बढ़ावन ताने।
बिसुनचुटकिया केहु न बूझे
पवनी-जन के जाने?
भूखे पेटे आल्हा गावे,
रगरे मोंछ सरेस।

गबर-गुसइयाँ बात न समुझल
होत परात पराइल।
जीअन मरन रहन रहवासू
अबले खबर न आइल।
कइली जोग जोगिनी कवनो
किया बनवली मेस।

सखिया,
कुररे काग भदेस।

  • दिनेश पाण्डेय

Related posts

Leave a Comment