किताब

बरहवीं क रेजल्ट आवे वाला ह किसना सुबेरेवै से भीतर-बाहर करत बा,खन मे कक्का केहन त खन मे माई केहन,मन ही मन आगे का होई यहू बात से डेरात ह,फेल त ना होइब,लेकिन अच्छा रिजल्ट आ जायी त विश्वविद्यालय में पढ़ब हे बजरंग बली निकै सबद सुनाया।

रजवा घराने क रघवा समने से आवत देखायल,हे किसना कहवाँ जात हउए,!चल जल्दी चल रिजल्ट निकल गयल हउए।चट्टी पर चलल जाय वही अखबार आयल होई, चल दउड़ के चल।किसना अउर रघवा एक सांस में चट्टी पर पहुंच गइनै, दूनो अखबार में मूड़ी गड़वलै हउए छाती धकधक करत बा…अरे किसना तोर फस्टडिविजन आयल हउए,हम त एहू साल फेल हो गइली।किसना आपन रिजल्ट देख के खुशी से भर गयल, आज ओकर बरसो क साध पुरी होत देखाये लगल।माई-बाबू क अशीष लेके किसना विश्व विद्यालय में दाखिला बदे चल दिहलेस…..।बड़ी मसक्कत के बाद कैइसहूँ दाखिला त मिलल,अब हास्टल क झंझट बडा़ पापड़ बेलले के बाद आखिर जुगाड़ बइठ गयल ।

गावं से निकल के शहर में अइला के बाद बुझाला की जिनगी बहुत कठिन बा।पहिली बेर जब कक्का रासन -पिसान धी क डिब्बा लेहले परिसर मे घुसनै त बड़-बड़ बिल्डिंग देखके चकरा गइनै।कहे लगनै अरे बचवा !तू त एमें हेराय जइबा।खैर समय बीतत गइल ….पढै़ -लिखै क त पहिले से सउख रहें इहवाँ अइले पर उ अउर बढ़ गयल पइसा बचाय-बचाय के किताब खरीदी,जब कउनो अच्छी किताब देखीं ओके लेवै बदे जी-जान एकै कै दी।मन ही मन सोचत रहि हमरहू पास आपन एक ठे लाइब्रेरी हो।ई सपना मन मे बसल रहे।यही बीच एक इन्टर कोलेज में नौकरी मिल गइल वही,रहे बदे एगो कोठरी क इन्तजाम हो गयल ।कोठरी मे एगो चौकी अउर छोट सा मेज एक ओरी स्टोप ,खाये पिये क समान रख के गृहस्थी शुरू कइनी मेजी पर किताब रखल देख मन गदगद हो जाय,।सबसे ऊपर बाणभट्ट क आत्मकथा। माई -बाबू शंकर कक्का से वादा निभउनै रधिका हमरे जीनगी में पत्नी बन परवेश कइनी।रधिका के गांवें मे स्कुल ना रहले के कारन आपन पढा़ई पुरी ना कै पउनी एकर मलाल ओनके जीनगी भर रहे।एगो बेटी अउर एगो बेटा पाके हम दोनो परानी बहुत खुश रहनी।भरल-पूरल परिवार अब का चाही भगवान से, सबकुछ त दे देहनै।जी पी यफ से लोन लेके एगो छोटा सा मकान ,एक रुम मे आपन लाइब्रेरी।अपने दिनचर्या क ज्यादा समय यही मे बीते अगर केहू खास मिले आवै त ओसे यही कमरा मे मिले -जूले। ये कमरा क साफ-सफाई अपने ही करै ।आपन किताब देख-देख के खुश हो जाय ।जब केहू उनसे किताबी पर बात करै तब एक-एक किताब के बारे मे बतावै ,बतावत समय उनकर चेहरा दमक उठै।अउर कुछ क सुध ना रहे।धीरे धीरे बचवा कुल बडा़ हो गयीनै ।बेटी क बियाह -दान हो गयल बेटा विदेश।पत्नी भी लम्बी बिमारी के बाद ….साथ छोड़ दिहनी।किसुन बहुत अकेल हो गइनै जइसे ओ घरे क हवा पानी ही चल गयल।ई त तब महसुस होला जब ओकर कमी खलेला।इनकर अकेलापन देख के बेटा बहु चिन्तित हो के कहे लगनै बाबूजी आगे क दू कमरा केराया पर चढ़ा दी कुछ मनसायन हो जायी! हमें मनसायन ना चाहि हम भले हयी।जेकर संगी साथी किताब हो ओके मनसायन बदे केहू क जरूरत ना,आपन बात कहत किसुन गेट से बहरे आ गइनै .।राति के पतोहू खाये क थरिया लेहले कहे लगनी का जिदीयायल हउआ।दू पइसा आयी,अउर मनसायन भी रही,अकेल जान केतना कमरा लेबा।पतोहू के आगे किसुन क एक ना चलल।

ले दे के इहें भइल पीछे क दू कमरा किराये पर उठा दियल जाय।बहुत मस्स्कत से एक ठे किरायेदार मिलल बैक मैनेजर रहल कहे लगल हमसे मिले -जूले वाला लोग आवैनै आगे क कमरा ही लेब, लइका क तेवर देख किसुन एक रूमे सिमट गइनै । आज याद आवे लगल एक-एक बेला फाकाँ कइके कइसे किताब खरीद दे ,कवन किताब गोस्ठी मे मिल रहल ,उपहार स्वरूप भी बहुत किताब मिलल रहल। याद करत नींद आवै लगल देखत हउए कि बरामदा मे एक ठे कबाड़ीवाला आयल ह किताब तउल -तउल के फेकत जात ह।ई कामिल ना ह ,एकर कुल पन्ना गल गयल हउए कहि-कहि के फेकत जात ह। किसुन चौकी पर से धम्म से गिर गइने। रिम झिमिआ गट्टा पकड़ के उठावत हउए उठा बाबा रोटी बना देहले हयी खा लिहा…..।।

 

  • डॉ ऋचा सिंह

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