पन्द्रह अगस्त मनावल जाई

झूठ साँच के लेवा गुदरी

फूँकि पहाड़ उड़ावल जाई

पन्द्रह अगस्त मनावल जाई।

 

बबुआ भइया सुन ए बचवा

ढरा गइल सब एके संचवा

लक़दक़ सजल आवल जाई

पन्द्रह अगस्त मनावल जाई।

 

भाँवरि घूमल बिहने बिहने

अरजी फरजी के का कहने

कबों बिचार बनावल जाई

पन्द्रह अगस्त मनावल जाई।

 

अरखे के कुल भाव-कुभाव

केकर केकर देखब सुभाव

सब गुड़ गोबर गावल जाई

पन्द्रह अगस्त मनावल जाई।

 

मरे जवान भा मरे किसान

माथे जरिको न पड़े निसान

निकहे ढ़ोल बजावल जाई

पन्द्रह अगस्त मनावल जाई।

 

बेरोजगार चरम पर रहिहें

आपन बथ्था कइसे कहिहें

कुछ ना सुनल सुनावल जाई

पन्द्रह अगस्त मनावल जाई।

 

छुआछूत कोरोना के सिर

मंहगाई बन छउंकी बीर

जनता रोई, रोवावल जाई

पन्द्रह अगस्त मनावल जाई।

 

कहीं क खुन्नस कहीं निकालल

मिलिहें लो चलनी के चालल

दिन में चाँन देखावल जाई

पन्द्रह अगस्त मनावल जाई।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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